हाईलाइट्स :
- सुलग रहा है एक और सामाजिक आंदोलन
- जातिगत आंदोलन से किसको होगा फायदा
- “बँटोगे तो कटोगे” का क्या होगा 2027 में
नई दिल्ली : प्रश्नपत्र लीक होने के मुद्दे पर केन्द्रीय शिक्षा मंत्रीका इस्तीफाकराने वाली काकरोच जनता पार्टी (CJP) के अगुआ नेताओं और कार्यकर्ताओं को अब केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से विरोध रखने वाली पर्टियों का खुला समर्थन मिल रहा है और चुनाव आयोग की सुधार प्रक्रिया SIR के खिलाफ गत शुक्रवार को हुए प्रदर्शन में तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति से CJP को आगामी योजनाओं के लिए काफी बल मिला है। SIR को लेकर कांग्रेस नेतृत्व को भी गत शुक्रवार को हुए प्रदर्शन से प्रेरणा मिली है और अब INDIA ब्लॉक ने केंद्र सरकार के खिलाफ लगातार आंदोलन की घोषणा की है। काँग्रेस सूत्रों के अनुसार यह आंदोलन मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा होने पर ही समाप्त होगा।
इन सबसे अलग मोदी सरकार के खिलाफ एक और आंदोलन धीरे-धीरे बड़ा आकार लेने की तैयारी में है। सोशल मीडिया पर इस आंदोलन से लाखों लोग जुड़ चुके हैं और गत जुलाई से लेकर सितंबर महीने तक दिल्ली सहित देश के कई राज्यों में इस अभियान को लेकर जोरदार प्रदर्शन भी हो चुके हैं। इसे आरक्षण हटाओ आंदोलन का नाम दिया गया है और सोशल मीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार दीपावली के बाद यह आंदोलन व्यापक रूप लेने वाला है। दावा है कि हाल ही में बिहार में हुए विधानसभा उपचुनाव में इस आंदोलन के प्रभाव से ही प्रशांत किशोर ने एनडीए को कड़ी शिकस्त दी।
आरक्षण हटाओ आंदोलन भारत में जाति-आधारित आरक्षण व्यवस्था का विरोध करने वाला एक उभरता हुआ नागरिक और सोशल मीडिया आधारित आंदोलन है। यह आंदोलन मुख्य रूप से इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से जुलाई-अगस्त 2026 में तेजी से फैला और इसके समर्थकों की संख्या लाखों में पहुंच गई।
जंतर-मंतर प्रदर्शन (अगस्त 2026):
21 अगस्त 2026 को इस आंदोलन के तहत नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए। दिल्ली पुलिस ने इस प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और केवल रामलीला मैदान में ही शांतिपूर्ण प्रदर्शन की छूट दी थी। जंतर-मंतर पर भीड़ जुटने के बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाने की कार्रवाई की और कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया। यूं तो इस अभियान का नाम आरक्षण हटाओ आंदोलन है लेकिन प्रदर्शन में शामिल अधिकतर लोग सीधे आरक्षण को ख़त्म करने के बजाए आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे थे।
आरक्षण हटाओ आंदोलन की प्रमुख मांगें:
- सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में जातिगत आरक्षण को समाप्त कर उसे पूरी तरह से आर्थिक आधार (Merit and Economic Need) पर लागू किया जाए।
- ‘एक परिवार, एक आरक्षण’ (One family, one reservation) का नियम लागू हो।
- सामान्य वर्ग के लिए एक राष्ट्रीय आयोग का गठन किया जाए।
- यूजीसी (UGC) के जाति-समानता नियमों की समीक्षा और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम में बदलाव की मांग।
आरक्षण का समर्थन और विरोध:
भारतीय संविधान में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए दस वर्ष के लिए आरक्षण की व्यवस्था करने की बात कही गई है। लेकिन, विगत कई दशकों से इसका दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। यूजीसी (UGC) के जाति-समानता नियमों को लेकर हाल ही में केंद्र सरकार की ओर से की गई पहल के बाद से ही यह आंदोलन शुरू हुआ है। इस आंदोलन में वो लोग शामिल हो रहे हैं, जिन्हें सरकार अगड़ी जाति के लोग मानती है। इस आंदोलन को करणी सेना और विभिन्न राज्यों में सक्रिय सामान्य श्रेणी (सवर्ण) हित मंचों का समर्थन मिला है।
वहीं, आलोचकों और आरक्षण समर्थकों का तर्क है कि यह व्यवस्था सामाजिक और ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने के लिए संवैधानिक रूप से आवश्यक है। आरक्षण के समर्थक कहते हैं कि गरीबी और जातिगत भेदभाव अलग-अलग समस्याएं हैं।
इस आंदोलन ने एक पुरानी बहस को नए सिरे से सामने ला दिया है कि क्या भारत में आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए? या फिर जब तक जातिगत असमानता और भेदभाव पूरी तरह खत्म न हो जाए तब तक आरक्षण ज़रूरी है। यही इस आंदोलन की मूल वैचारिक लड़ाई है।
आंदोलन का कितना प्रभाव?
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के किसी बड़े नेता ने इस आंदोलन के समर्थन में अभी तक कोई बयान नहीं दिया है। यही नहीं, इस आंदोलन को अभी किसी बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक दल का औपचारिक समर्थन हासिल नहीं है। फिलहाल, इस आंदोलन के समर्थक मुख्य रूप से सामान्य वर्ग के युवा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र, युवा पेशेवर और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग हैं, जिनमें अधिकतर तथाकथित अगड़ी जातियों से आते हैं। हालांकि, सोशल मीडिया पर चर्चा में रहने वाले कुछ लोगों ने ज़रूर आरक्षण व्यवस्था की आलोचना की है।
आरक्षण हटाओ आंदोलन का बड़ा तर्क है कि आज किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को उसकी जाति से ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए। आरक्षण विरोधी आंदोलन में ‘मेरिट’ सबसे प्रमुख शब्दों में से एक है। प्रदर्शन के दौरान अधिकतर लोग एक जैसा ही तर्क देते हुए कहते हैं, “रिज़र्वेशन की वजह से मेरिट वालों को नौकरी नहीं मिल पा रही है। “प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि चयन का आधार व्यक्ति की क्षमता और प्रदर्शन होना चाहिए, न कि उसकी जाति।
क्या है भाजपा और उसकी सरकार का रुख?
बीजेपी की आधिकारिक राष्ट्रीय नीति आरक्षण ख़त्म करने की नहीं रही है। केंद्र सरकार एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने के साथ-साथ आरक्षित पदों की रिक्तियां भरने पर ज़ोर दे रही है। हाल में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में एससी/एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने के विचार का विरोध भी किया है। सरकार का कहना है कि एससी/एसटी आरक्षण का आधार आर्थिक पिछड़ापन नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव है।
दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक द्वारा रिज़र्वेशन रिफॉर्म से जुड़े प्रदर्शनकारियों से बातचीत ने राजनीतिक बहस को ज़रूर तेज किया है। विपक्षी दल इस मुद्दे पर अधिक स्पष्ट रूप से आरक्षण के विस्तार और जातिगत प्रतिनिधित्व के पक्ष में हैं। कांग्रेस जाति जनगणना और 50 फीसदी की आरक्षण सीमा हटाने की बात करती रही है। समाजवादी पार्टी जाति जनगणना और आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व की मांग करती है। राष्ट्रीय जनता दल भी आरक्षण की सीमा बढ़ाने और निजी क्षेत्र में आरक्षण का समर्थन करती रही है। बहुजन समाज पार्टी मौजूदा एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण को कमजोर करने के किसी भी प्रयास का विरोध करती है। कुल मिलाकर इस आंदोलन को किसी भी बड़े राजनीतिक दल का समर्थन नहीं है। लेकिन, सोशल मीडिया पर खासकर अगड़ी जाति के युवा वर्ग की प्रतिक्रिया से 2027 में उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव का प्रभावित होना तय है। खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार के चुनाव में आज भी जातिगत समीकरण ही चुनाव का भविष्य तय करते हैं। ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का वह कथन – “बँटोगे तो कटोगे” कितना काम आएगा यह आने वाला समय ही बताएगा।
















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