मंगल चाहते हो तो जगत का नहीं जगदीश का करो ध्यान :श्रीकांत शर्मा ‘बालव्यास ‘

कोलकाता : जीवन में जब भी संत-दर्शन हो तो उसे कृष्ण – कृपा समझना चाहिए। स्वयं नारद जी वेद व्यास जी से कहा है -‘संत -कृपा से मैं दासी पुत्र से नारायण का पुत्र बना। नारायण ही ने मुझे वीणा देकर कीर्तन करने के आदेश दिया।’ जीवन में संत आए तो समझो भगवान आ गए। तारों के माध्यम से जैसे बिजली आती है वैसे ही संतों के माध्यम से ठाकुर आते हैं। सत्संग करने से ही उद्धव को श्रीमद्भागवत का ज्ञान हुआ। जब भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीला का विश्राम करके जाने लगे तो उद्धव ने कहा,”हे गोविन्द! धरती को छोड़कर जा रहे हैं, फिर से राक्षस आ जाएंगे। जब आप जा ही रहे हैं तो कलिकाल के भक्तों को दवा बता दीजिए। “इसे सुनकर श्रीकृष्ण ने अपना हृदय निकालकर श्रीमद्भागवत में प्रवेश कर गए।
श्रीमद्भागवत पुराण भगवान श्रीकृष्ण का घर है। सनातन धर्म के विकास के लिए वेदव्यास ने पुराणों की रचना की। वेदव्यासजी ने महाभारत लिखा जिसे पांचवा वेद कहा गया। इतना सब लिखने के बावजूद वेदव्यासजी को शांति नहीं मिली तब उन्होंने नारद जी को अपनी पीड़ा को बताई। तब नारद ने कहा अब तू श्रीकृष्ण की कथा श्रीमद्भागवत लिखो। जब वेदव्यास जी ने श्रीमद्भागवत लिखा तब उन्हें परम आनंद की प्राप्ति हुई।
ये बातें राजस्थान गौ कल्याण ट्रस्ट के तत्वावधान में श्रीमद्भागवत कथा पर प्रवचन करते हुए परम पूज्य आचार्य श्रीकांत शर्मा ‘बालव्यास’ ने गणपति राजेश सभागार में कहीं। कथा के मुख्य यजमान सीमा अग्रवाल, अखिलेश अग्रवाल के संग रिंकी बजाज, विकास बजाज व विशाल बजाज ने व्यासपीठ का पूजन किया। आयोजन समिति के सदस्य प्रकाश केडिया ने बताया कि यह श्रीमद्भागवत कथा सुरभि सदन गौशाला के निर्माण, विकास और संचालन हेतु आयोजित की गई है। इस अवसर पर सजन कुमार बंसल, जगमोहन बागला, श्रीराम अग्रवाल सहित अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे। कथा को सफल बनाने में ट्रस्टीगण के संग रामस्वरूप गोयनका, सिद्धार्थ दीवान, अजय अग्रवाल (सोनू), विनय मस्करा, रमेश अग्रवाल, रजनीकांत बालासरिया, राजीव छापड़िया सहित अन्य सदस्य सक्रिय रहे। कार्यक्रम संचालन संजय मस्करा ने किया।

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