पश्चिम बंगाल में अभी कुछ ही महीने पहले सत्ता परिवर्तन हुआ है और सत्ता जाते ही वाममोर्चा को धूल चटाने वाली ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस टुकड़ों में बंट गयी है। स्थिति यह है कि अब संसद, विधानसभा और अदालत की मदद से पता किया जा रहा है कि कौन असली है और कौन नकली। तृणमूल का तमाशा तो सरेआम हो रहा है, लेकिन उससे भी आश्चर्य की बात यह है कि बंगाल में सत्ता सँभालने वाली भाजपा में भी असली – नकली का खेल चल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि भाजपा में चल रहा खेल का अभी उजागर होना बाकी है।
भाजपा में इस खेल की शुरूआत करने वाले दूसरे दलों से आये मौका परस्त कुछ रसूखदार और तथाकथित बाहुबली किस्म के घुसपैठिये हैं। यह सबको पता है कि मौके का फायदा उठाने के लिए दूसरी राजनीतिक पार्टियों से बड़ी संख्या में दागी नेता और तथाकथित समाजसेवी लोग बंगाल की भारतीय जनता पार्टी में घुसपैठ कर चुके हैं। बड़े-बड़े कारनामे कर चुके ऐसे ही कुछ लोग भाजपा में शामिल होकर प्रशासन की नजरों से बचे हुए हैं और कुछ भाजपा के प्रदेश नेताओं तथा मंत्रियों को आर्थिक चमक-दमक प्राप्त करने का रास्ता दिखाने में जुट गए हैं। एक बहुत ही प्रचलित कहावत है कि “चोर चोरी से जाए, हेरा फेरी से न जाए।” अर्थात अगर चोर को किसी साधु की कुटिया में रहकर शिक्षा दिया जाने लगे तो संभव है कि वो चोरी छोड़ सकता है लेकिन अपनी हेरा फेरी की आदत फिर भी नहीं छोड़ पाता है।
जैसी जानकारी मिल रही है कि ऐसे ही कुछ लोग आगामी दिसंबर में प्रस्तावित नगर निगम और नगर पालिकाओं के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का टिकट प्राप्त करने की जुगाड़ में भी अभी से लग गए हैं। बंगाल भाजपा के पुराने नेता और कार्यकर्ता इन घुसपैठियों से लगभग हर रोज त्रस्त हो रहे हैं। फिर भी अधिकांश पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को अभी भी अपने नेतृत्व पर भरोसा है। उन्हें भरोसा है कि दागी घुसपैठिये जल्दी ही पार्टी से निकाले भी जाएंगे और अपने किये की सजा भी भोगेंगे।
बंगाल भाजपा में लगभग लगभग दो दशक से सक्रिय रहे एक वरिष्ठ नेता ने अपना अनुभव सुनाते हुए उदाहरण के लिए एक प्रत्यक्ष अनुभव बताया – “चुनाव के दौरान कोलकाता के एक मतगणना केंद्र पर भारतीय जनता पार्टी के कैम्प में लगभग दो दर्जन कार्यकर्ता चुनाव परिणाम की प्रतीक्षा में बैठे थे। दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस के कैंप में सैकड़ो कार्यकर्ता थे। हमारे कैंप में लोगों की सुरक्षा के लिए पुलिस के कुछ जवान भी उपस्थित थे और इससे यह आशंका बन रही थी कि तृणमूल कांग्रेस के लोग हम पर हमला क़र सकते हैं। हम लोग डरे सहमे चुनाव परिणाम का इंतजार कर रहे थे। जैसे ही चुनाव परिणाम भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जाता दिखा, पता नहीं कहां से सैकड़ो लोग भाजपा का झंडा लिए हमारे कैंप में उपस्थित हो गए। उनमें से अधिकांश लोगों को तो हम पहचानते भी नहीं थे। हमारे विजयी प्रत्याशियों को भी सबसे पहले उन्होंने ही माला पहनाकर उनका स्वागत किया। और अब स्थिति यह है कि वे लोग ही हमारे नेताओं के आगे पीछे दिन रात घूम रहे हैं। हम लोग जो पुराने कार्यकर्ता हैं, उनमें से अधिकांश लोग अपनी ही पार्टी के नेताओं और मंत्रियों की उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। फिर भी हमें भरोसा है कि हमारे प्रदेश नेतृत्व को घुसपैठियों के बारे में सब कुछ पता है और समय से उनका इलाज भी जरूर होगा।”
सूत्रों की मानें तो यह स्थिति केवल कोलकाता में ही नहीं है, बल्कि प्रदेश के प्रत्येक जिले में भारतीय जनता पार्टी के जमीनी स्तर के कार्यकर्ता कुंठा के शिकार हो रहे हैं। सबको पता है कि भारतीय जनता पार्टी लगभग 46% वोट लेकर के सत्ता में आई है। अर्थात राज्य के कुल मतदाताओं में से 54 प्रतिशत ने भाजपा के खिलाफ वोट किया था। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो भारतीय जनता पार्टी को लगभग 14-15 प्रतिशत वोट ममता बनर्जी के समर्थकों ने ही दिया था क्योंकि वह कैमक स्ट्रीट कार्यालय से पार्टी को नियंत्रित किए जाने के विरोध में थे। सत्ता में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने पिछले तीन-चार महीनों में कितने विरोधी विचार वाले लोगों को अपने पक्ष में किया है, यह आगामी दिसंबर में नगर निगम और नगर पालिकाओं के होने वाले चुनाव में पता चल जाएगा। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं पर ज्यादा भरोसा करती है या फिर दूसरे पार्टी से आए घुसपैठियों पर। ©तारकेश्वर मिश्र








Leave a Reply