हर किसी को है एक अदद संत की तलाश !

कोलकाता और आसपास के इलाकों में लगभग 1000 से अधिक बड़ी दुर्गा पूजा कमेटियों के पदाधिकारी इस समय साधु-संत की तलाश में भटक रहे हैं। सनातन धर्म के विभिन्न धार्मिक संस्थाओं से संपर्क किया जा रहे है और कुछ लोगों ने तो बाकायदा इसके लिए एजेंसियों की नियुक्ति कर दी है। उन्हें अपने पूजा आयोजन के खूंटी पूजन और साथ ही साथ उद्घाटन के लिए साधु-संत को बुलाने की व्यवस्था करनी है।

वैसे यह समस्या बहुत बड़ी नहीं है लेकिन, अगर ठीक से नहीं समझे तो बहुत बड़ी भी है। वर्षों के संघर्ष के बाद बंगाल में सत्ता संभालने वाली भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार अपने नेताओं और मंत्रियों को कटमनी, तोलाबाजी और भ्रष्टाचार के आरोपों से दूर रखने के लिए फूंक-फूंक कर कदम उठा रही है। हाल ही में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने बयान जारी कर अपनी पार्टी के मंत्रियों और नेताओं से कहा था कि आप किसी भी पूजा कमेटी के पदाधिकारी ना बनें। फिर यह भी बयान आया कि पार्टी के नेताओं और मंत्रियों को पूजा आयोजनों के उद्घाटन और खूंटी पूजन से दूर रहना चाहिए। यह सही भी है क्योंकि विगत वर्षों में ऐसे ही आयोजनों में नेताओं और मंत्रियों को सामने रखकर आम जनता से वसूली की घटनाएं होती आई हैं। मुख्यमंत्री और भाजपा पार्टी प्रमुख के इस फरमान से चिंतित पूजा कमेटियों को बाद के एक बयान में मुख्यमंत्री ने एक विकल्प प्रदान किया और कहा की पूजा कमेटियों को साधु-संतों को बुलाकर अपने आयोजनों का उद्घाटन कराना चाहिए। अब लगभग सभी पूजा कमेटियों के पदाधिकारियों ने अपने आयोजनों के लिए किसी नामी गिरामी संत की तलाश शुरू कर दी है।


समस्या गंभीर हो गई है। क्योंकि हर किसी को कोई नामी गिरामी संत ही चाहिए और वो मिल नहीं रहे। मिलें भी तो कैसे? संत को पहचानने के लिए उनके पास अलग दृष्टि होनी चाहिए। सबसे पहले तो उन्हें यह जानना चाहिए कि संत कहते किसको हैं? सनातन धर्म ग्रंथो के अनुसार संत की परिभाषा और लक्षण निम्न प्रकार से हैं –

परिभाषा : संत वह उच्च कोटि का महात्मा, ईश्वर-भक्त या पवित्रात्मा व्यक्ति है, जिसका अंतःकरण पूरी तरह निर्मल, शांत और मोह-माया से मुक्त हो चुका हो।

संत के मुख्य लक्षण
1. समदृष्टि: संत सभी जीवों को एक समान देखता है और किसी को अपना शत्रु नहीं मानता।
2. सहनशीलता (तितिक्षा): मान-अपमान या सुख-दुःख में जो व्यक्ति पूरी तरह अडिग और शांत रहता है।
3. परोपकार: जो सदा सबका भला सोचता है और अपने आचरण से किसी को भी दुःख नहीं पहुँचाता।
4. वेश से परे: संत की पहचान उसके बाहरी पहनावे (वेश) से नहीं, बल्कि उसके आंतरिक गुणों और आचरण से होती है।

अब अगर हम इस परिभाषा और लक्षण को ध्यान में रखते हुए अपने आसपास ही नजर दौड़ाएं तो हमें हमारे अपने समाज में ही हजारों नहीं तो सैकडों संत जरूर दिख जाएंगे।
सनातन धर्म ग्रंथो और परंपरा के अनुसार अगर कोई व्यक्ति अपने व्यापार वाणिज्य और परिश्रम से अर्जित धन का 10% भगवान की सेवा और सत्कर्मों में लगाता रहता है तो उसका अर्जित धन शुद्ध होता है और ऐसे धन वाले व्यक्ति को हम गृहस्थ संत कहते हैं।
अब अगर हम अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो हमें निम्न प्रकार के लोग अपना व्यापार वाणिज्य, उद्योग और परिवार संभालते हुए अहर्निश सेवा करते हुए मिल जाएंगे –
1. हमारे महानगर में एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनको देश के विभिन्न तीर्थ में जप-तप करने वाले सैकड़ो ऋषि, मुनि और संत धर्म की साक्षात् प्रतिमूर्ति बताते हैं।
2. हमारे समाज के सैकड़ो लोग गौ रक्षा और गौ सेवा से निरंतर जुड़े हुए हैं।
3. सैकड़ो लोग जरूरतमंद लोगों की निशुल्क चिकित्सा व्यवस्था के अभियान से वर्षों से जुड़े हुए हैं।
4. दर्जनों लोग पर्यावरण और वातावरण की शुद्धता के अभियान से जुड़कर पेड़ लगाने में लगे हैं। कुछ लोग तो एक या सवा लाख पीपल के वृक्ष लगा चुके हैं।
5. कुछ लोग वर्षों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार अपने खर्चे पर करा रहे हैं।
6. कुछ लावारिस बच्चे – बच्चियों का जीवन संवारने में लगे हुए हैं।


ऐसे सैकड़ो और हजारों लोगों से हम कहीं न कहीं हर रोज मिलते हैं। उन्हें हम भी जानते हैं और आप भी जानते हैं। इसी कारण से हमने किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लिखा है। किसी सरकार या संस्था से इन्हें सम्मान की चाह भी नहीं है। संत की तलाश में लगे लोग अगर ठीक से अपनी दृष्टि को दौड़ आएंगे तो उन्हें शीघ्र ही उनको अपनी समस्या का समाधान भी मिल जाएगा। हमें पूरा विश्वास है कि हमारे इस आलेख से कुछ लोगों के सोचने और देखने का नजरिया जरुर बदलेगा और अगर ऐसा हुआ तो मैं अपने को धन्य समझूंगा। ©तारकेश्वर मिश्र

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