पद्मा (परिवर्तनी) एकादशी के अवसर पर बन रहे हैं शुभ योग

22 सितंबर को परिवर्तिनी एकादशी के दिन रवि योग रहेगा। यह योग सुबह 6:09 बजे से 7:06 बजे तक रहेगा. इसकी कुल अवधि 57 मिनट होगी। इसके अलावा, इस दिन अतिगंड योग और सुकर्मा योग भी रहेंगे। इन योगों के कारण इस दिन का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है।

मान्यता है कि इस एकादशी को भगवान शयन करते हुए करवट लेते हैं, इसलिए तीनों लोकों के पालनहार भगवान विष्णु का इस दिन पूजन करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण का कथन है – “जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं। जो इस पापनाशक कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हज़ार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।”

व्रत कथा:

युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान ! भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, इस उत्तम वामन एकादशी का माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो।
यह एकादशी जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें। जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया।
अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। भगवान के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान ! मेरी जिज्ञासा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि को बाँधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएँ कीं? चातुर्मास के व्रत की क्या ‍विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है। सो आप मुझसे विस्तार से बताइए।


श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन ! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें। त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था। दैत्य कुल में जन्म लेने के बावजूद वह मेरा परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था। लेकिन, इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया। इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर विष्णुलोक गए। बृहस्पति सहित इंद्रादिक देवता प्रभु के निकट जाकर और नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुति करने लगे। अत: मैंने वामन रूप धारण करके पाँचवाँ अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत लिया।
इतनी वार्ता सुनकर राजा युधिष्ठिर बोले कि हे जनार्दन ! आपने वामन रूप धारण करके उस महाबली दैत्य को किस प्रकार जीता? श्रीकृष्ण कहने लगे- मैंने (वामन रूपधारी ब्रह्मचारी) बलि से तीन पग भूमि की याचना करते हुए कहा- ये मेरे लिए तीन लोक के समान है और हे राजन यह तुमको अवश्य ही देनी होगी।


राजा बलि ने इसे तुच्छ याचना समझकर तीन पग भूमि का संकल्प मुझको दे दिया और मैंने अपने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर यहाँ तक कि भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर सत्यलोक में मुख, उसके ऊपर मस्तक स्थापित किया। सूर्य, चंद्रमा आदि सब ग्रह गण, योग, नक्षत्र, इंद्रादिक देवता और शेष आदि सब नागगणों ने विविध प्रकार से वेद सूक्तों से प्रार्थना की। तब मैंने राजा बलि का हाथ पकड़कर कहा कि हे राजन ! एक पद से पृथ्वी, दूसरे से स्वर्गलोक पूर्ण हो गए। अब तीसरा पग कहाँ रखूँ?


तब बलि ने अपना सिर झुका लिया और मैंने अपना पैर उसके मस्तक पर रख दिया जिससे मेरा वह भक्त पाताल को चला गया। फिर उसकी विनती और नम्रता को देखकर मैंने कहा कि हे बलि ! मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूँगा। विरोचन पुत्र बलि से कहने पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर मेरी मूर्ति स्थापित हुई। इसी प्रकार दूसरी क्षीरसागर में शेषनाग के पष्ठ पर हुई ! जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं। जो पापनाशक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हज़ार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

व्रत विधि :

इस एकादशी के दिन जो व्यक्ति व्रत करता है, उसे भूमि दान करने और गाय का दान करने के पश्चात मिलने वाले पुण्य फलों से अधिक शुभ फलों की प्राप्ति होती है। इस व्रत में धूप, दीप, नेवैद्य और पुष्प आदि से पूजा करने का विधि-विधान है। एकादशी तिथि से पूर्व की तिथि अर्थात दशमी तिथि को किसी धान्य का सेवन नहीं करना चाहिए। कुम्भ के ऊपर विष्णु की मूर्ति रखकर पूजा की जाती है। इस व्रत को करने के बाद रात्रि में विष्णु नाम का पाठ करना चाहिए। यह व्रत दशमी तिथि से शुरु होकर द्वादशी तिथि तक जाता है, इसलिये इस व्रत की अवधि सामान्य व्रतों की तुलना में कुछ लम्बी होती है। एकादशी तिथि के दिन पूरे दिन व्रत कर अगले दिन द्वादशी तिथि के प्रात:काल में स्नान और पूजन के बाद ही अन्न ग्रहण किया जाता है।
सनातन धर्म के सर्वमान्य सदग्रंथ पद्म पुराण के अनुसार एकादशी व्रत करने वाले व्यक्ति पर भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। इस व्रत को करने वाले के लिए संसार का हर सुख सामान्य प्रयास से ही सुलभ होता है और उनके लिए मोक्ष का द्वार खुला रहता है।
©तारकेश्वर मिश्र

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *