पंडित लक्ष्मीकांत तिवारी की उपस्थिति और प्रबुद्ध श्रोताओं का समागम
कोलकाता : श्रीमद् भागवत कथा मनुष्य को सुगमता पूर्वक जीवन जीने के साथ ही जीव को आवागमन के बंधन से मुक्त करने की कथा है। इस कथा का श्रवण करने वाला व्यक्ति भगवान से एकाकार होकर अपने सहज स्वरूप को स्वयं जान पाता है। उक्त बातें कोलकाता के अहिरिटोला स्थित कान्यकुब्ज भवन में श्रीमद भागवत कथा सप्ताह का प्रारंभ करते हुए सुप्रसिद्ध कथा व्यास आचार्य डॉक्टर वेंकटेश मिश्र ने व्यास पीठ से कहीं।

आचार्य श्री ने श्रीमद् भागवत कथा के महत्व को बताते हुए कहा – किसी भी विषय, वस्तु या व्यक्ति को देखने और उसका दर्शन करने में अंतर होता है। देखना एक सामान्य क्रिया है लेकिन दर्शन करना दिव्य दृष्टि से अनुभूति करने जैसा है। अर्जुन कृष्ण को अपना सखा मानते थे लेकिन जब उन्होंने दिव्या दृष्टि से उनका दर्शन पाया तो उन्हें भगवान माना। आज समय और युग का प्रभाव ऐसा है कि मनुष्य को यह कहना पड़ता है कि तुम मनुष्य बन। हमें पशु को या नहीं कहना पड़ता है कि तू पशु बन। मनुष्य अपने स्वाभाविक को नैसर्गिक गुणों से दूर होता चला जा रहा है। इसलिए आज के समय में इस तरह के धार्मिक और सामाजिक आयोजनों की बहुत आवश्यकता है।
भारत के संत जन जिन्हें धर्म की प्रतिमूर्ति बताते नहीं थकते हैं ऐसे धर्मानुरागी, परम पूज्य पंडित लक्ष्मीकांत तिवारी(भैयाजी) की पावन उपस्थित और समाज सेवा में सदा अग्रणी रहने वाले इस कथा के संयोजक सुनील अवस्थी, रामलाल तिवारी, आशुतोष बाजपेई और सतीश शुक्ल के नेतृत्व में की गई दिव्या व्यवस्था से आयोजन में चार चांद लग गए हैं। प्रथम दिवस के आयोजन की मुख्य यजमान पंडित लक्ष्मीकांत तिवारी(भैयाजी) और श्रीमती शकुंतला तिवारी ने व्यासपीठ का पूजन और भगवान की आरती की। इस आयोजन को गरिमामयी बनाने के लिए दीपक मिश्र (अध्यक्ष,कलकत्ता कान्यकुब्ज सभा), कुलदीप दीक्षित (सचिव,कलकत्ता कान्यकुब्ज सभा), दया शंकर मिश्र, सुनील अवस्थी, वीरेंद्र त्रिवेदी, अजय तिवारी,
बच्चू पांडे, मनीष बाजपेई, वीरेंद्र तिवारी, संगम पांडेय, मुकेश शर्मा, अशोक तिवारी, सुनील दीक्षित, सत्यम मिश्रा, पूनम दीक्षित, रेखा बाजपेयी, शीला अवस्थी, प्रेम बाजपेयी, नीतू दीक्षित, मल्लिका बाजपेयी, शकुन पांडे और दुर्गा त्रिवेदी का विशेष योगदान सराहनीय है।










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