कलकत्ता हाई कोर्ट ने KMC चुनावों का रास्ता साफ किया

मुख्य बातें :

  1. अदालत ने वार्ड परिसीमन पर रोक लगाने से इनकार किया
  2. राज्य सरकार को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश
  3. याचिका में वैधानिक शक्तियों का गलत इस्तेमाल का आरोप

कोलकाता : कलकत्ता हाई कोर्ट ने गुरुवार को कोलकाता नगर निगम (KMC) को किसी भी तत्काल कानूनी बाधा से मुक्त कर दिया। कोर्ट ने नगर निकाय में वार्डों के परिसीमन को चुनौती देने वाली याचिका पर कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। जस्टिस हिरण्मय भट्टाचार्य ने अंतरिम हस्तक्षेप की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन पूरे मामले को खत्म नहीं किया। उन्होंने राज्य सरकार और याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि मामले की अगली सुनवाई से पहले वे अपने हलफनामे (affidavits) दाखिल करें।

कोर्ट ने राज्य सरकार को तीन सप्ताह के भीतर इस बात पर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है कि क्या यह मामला सुनवाई योग्य (maintainable) है या नहीं। वहीं, याचिकाकर्ताओं को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब देना होगा। अब इस मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद होगी।

यह याचिका दीपू दास ने दायर की है, जो पूर्व पार्षद रह चुके हैं। वे उस समय पार्षद थे जब राज्य में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) [CPI(M)] की सरकार थी। याचिका में राज्य सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह 11 सितंबर, 2026 की उस अधिसूचना को रद्द करे, जिसके तहत कोलकाता के मूल 144 वार्डों की सीमाओं का परिसीमन करके उन्हें बढ़ाकर 209 वार्ड कर दिया गया था। आरोप है कि ऐसा करते समय उचित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।

याचिका के अनुसार, जब 209 वार्डों की प्रस्तावित सीमाओं पर आपत्तियां दर्ज कराने की बात आई, तो अन्य पक्षों को वैकल्पिक प्रस्ताव या आपत्तियां देने के लिए बहुत कम समय दिया गया, या फिर उनकी आपत्तियों पर कोई विचार ही नहीं किया गया। याचिका में कहा गया है, “कोलकाता नगर निगम के चुनावों में हिस्सा लेने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों की स्पष्ट आपत्तियों के बावजूद, अधिकारियों ने इन आपत्तियों पर विचार नहीं किया और न ही परिसीमन के पीछे का कोई तर्कसंगत आधार बताया। इसलिए, यह अधिसूचना मनमानी और भेदभावपूर्ण है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, और इसमें बिना सोचे-समझे निर्णय लेने के साथ-साथ वैधानिक शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया गया है।”

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि पहले से मौजूद कई वार्डों की सीमाओं में इस तरह बदलाव किया गया है, जिससे मतदाताओं की संख्या और वार्डों के आकार पूरी तरह से बदल गए हैं।

याचिका में नए सिरे से तय किए गए वार्डों के आकार में असमानता होने का भी आरोप लगाया गया है। याचिका में वार्ड-वार आंकड़ों का जिक्र है, जिसके अनुसार हर वार्ड में औसतन 15,149 मतदाता हैं। हालांकि, असल में ये आंकड़े बिल्कुल असंतुलित हैं। सबसे छोटे वार्ड, वार्ड नंबर 57 में केवल 5,655 मतदाता हैं, जबकि सबसे बड़े वार्ड, वार्ड नंबर 66 में 28,000 से ज्यादा मतदाता हैं। यानी, दूसरा वार्ड पहले वाले के मुकाबले लगभग पांच गुना बड़ा है।

याचिका में आगे कहा गया है कि यह असंतुलन सिर्फ इन दो चरम उदाहरणों तक सीमित नहीं है; लगभग 23 वार्ड ऐसे हैं जिनमें 12,000 से कम मतदाता हैं, जबकि 7 वार्ड (जिनमें वार्ड 45, 56, 66, 121, 128 और 175 शामिल हैं) ऐसे हैं जिनमें 20,000 से ज्यादा मतदाता हैं। अन्य तर्कों के अलावा, याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि इस पूरी प्रक्रिया के पीछे राजनीतिक मकसद है। उनका तर्क है कि जिन इलाकों में अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को ज्यादा वोट मिले थे, वहां के वार्ड छोटे कर दिए गए; जबकि जिन इलाकों में BJP का समर्थन कम था, उन्हें बड़े वार्डों में शामिल कर दिया गया।

याचिका में कहा गया है, “ऐसा लगता है कि यह प्रक्रिया पिछले चुनावी नतीजों से प्रभावित है, जिसका मकसद सत्ताधारी राजनीतिक दल को अनुचित फायदा पहुंचाना है। इस तरह, कोलकाता नगर निगम अधिनियम, 1980 की धारा 601 के तहत मिली वैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल बाहरी कारणों से किया गया है, और इसमें संबंधित जनसांख्यिकीय (demographic) तथा भौगोलिक आंकड़ों पर उचित विचार नहीं किया गया है।”

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विकास रंजन भट्टाचार्य ने अदालत को बताया कि परिसीमन (delimitation) की यह प्रक्रिया तब हुई जब KMC (कोलकाता नगर निगम) का कोई निर्वाचित बोर्ड मौजूद नहीं था। सत्ता परिवर्तन के कारण पिछला बोर्ड भंग हो चुका था, और यह प्रक्रिया नगर आयुक्त (Municipal Commissioner) की सिफारिश पर पूरी की गई। उन्होंने आगे कहा कि नगर आयुक्त, जो कि एक अधीनस्थ कर्मचारी हैं, वे KMC की भूमिका नहीं निभा सकते। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि मतदाताओं के बीच कोई समानता नहीं बन पाई है, क्योंकि वार्डों की सीमाओं को फिर से तय करने का काम बिना सोचे-समझे, यांत्रिक तरीके से किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि भविष्य में वोट हासिल करने के लिए, मौजूदा सत्ताधारी दल ने ही पूरी प्रक्रिया को इस तरह से तैयार किया है।

वरिष्ठ वकील ने कहा कि परिसीमन का प्रस्ताव रखने वाली अधिसूचना जारी करते समय, नए 209 वार्ड पार्षदों को शामिल करने के लिए ‘कोलकाता नगर निगम अधिनियम’ की धारा 5(2) में जरूरी संशोधन भी नहीं किया गया था। उन्होंने आगे कहा कि इसके बजाय, विधानसभा ने बाद में बिना किसी ठोस चर्चा के जल्दबाजी में एक संशोधन विधेयक पारित कर दिया।

KMC की ओर से पेश हुए एडवोकेट जनरल सुरोजित नाथ मित्रा ने इन तर्कों का खंडन किया।

याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि इनमें से किसी भी मुद्दे पर विचार नहीं किया जा सकता, क्योंकि याचिकाकर्ता के अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि वार्डों के परिसीमन की प्रक्रिया में सभी जरूरी नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया गया है। KMC के 209 वार्डों में कुल 4,711 मतदान केंद्र होने की उम्मीद है, जिनके लिए लगभग 22,600 मतदान कर्मियों की आवश्यकता होगी।

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