चुनाव में धनबल का उपयोग अब बुरा नहीं रहा

Highlights:

  1. धनबल के उपयोग से ही भाजपा ने बंगाल पर विजय प्राप्त की


2. बंगाल जीतने के लिए भाजपा ने पानी की तरह बहाया पैसा


3. अकेले एक राज्य में खर्च किए 286 करोड़ से ज्यादा


कोलकाता : विगत कुछ दशकों में भारतीय राजनीति में धनबल बहुत बड़ा फैक्टर बनाकर उभरा है। चुनाव जीतने के लिए धनबल का उपयोग धड़ल्ले से होता आ रहा है और कुछ दशक पहले की तरह अब इसका विरोध भी नहीं होता है। कानूनी तौर पर चुनाव में धनबल और बाहुबल के दुरुपयोग पर अभी भी प्रतिबंध है, लेकिन इसके विपरीत लगभग सभी राजनीतिक दल अपनी क्षमता के अनुसार धन बल और बाहुबल का उपयोग करके ही चुनाव लड़ते हैं। राष्ट्रीय राजनीति में जब भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में हुआ करती थी तो उसने सरकार से इलेक्शन की फंडिंग की बात उठाई थी। तर्क यह था कि अगर सभी प्रत्याशियों के चुनावी खर्च सरकार उठाये तो धनबल का दुरुपयोग रोका जा सकेगा। साथ ही चुनाव में भारी खर्च का बोझ अंततः जनता को ही उठाना होता है। महंगाई बढ़ती है आदि आदि।


कभी भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टी इन शेषन भी चुनाव सरकारी खर्च पर कराने और प्रत्याशियों को सरकार की ओर से खर्च दिए जाने के पक्ष में थे। एक मुलाकात के दौरान शेषन ने कहा था कि अगर चुनाव में निष्पक्षता बनाए रखनी है तो उसमें धनबल का दुरुपयोग रोका जाना एक सबसे बड़ा फैक्टर है। आश्चर्य इस बात का है कि आज भारतीय जनता पार्टी स्वयं केंद्र में सत्ता संभाल रही है और वह अपने इस विषय को भूल चुकी है। चुनाव आयोग ने जो आंकड़े जारी किए हैं उसे पता चलता है कि इस समय देश में किसी भी चुनाव में सबसे अधिक पैसा भारतीय जनता पार्टी ही खर्च कर रही है। चुनाव में आधिकारिक तौर पर किया गया खर्च तो मामूली है, गैर आधिकारिक खर्च भी बहुत अधिक है।


निर्वाचन आयोग के पास दाखिल किए गए चुनावी खर्च के विवरण से एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। इसके अनुसार, भाजपा ने अकेले बंगाल विधानसभा चुनाव में कुल 286.99 करोड़ रुपये खर्च किए। यह राशि कांग्रेस पार्टी द्वारा पांच राज्यों (चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश) के चुनावों में किए गए कुल खर्च 248.55 करोड़ रुपये से भी अधिक है। आयोग के मुताबिक, हाल ही में हुए पांच राज्यों – बंगाल, असम, केरलम, तमिलनाडु और पुडुचेरी – में भाजपा का कुल चुनावी खर्च 529.38 करोड़ रुपये रहा। इसमें से आधे से अधिक यानी 286.99 करोड़ रुपये अकेले बंगाल में खर्च किए गए।


बंगाल में पार्टी ने सामान्य प्रचार पर 217.16 करोड़ रुपये और उम्मीदवारों पर 69.83 करोड़ रुपये खर्च किए। हालांकि, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) मुख्य प्रतिद्वंद्वी रही, लेकिन टीएमसी का आधिकारिक खर्च विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।


दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी ने बंगाल में अपने केंद्रीय मुख्यालय और प्रदेश इकाई के जरिये कुल 42.08 करोड़ रुपये खर्च किए (जिसमें 12.96 करोड़ प्रचार पर और 29.12 करोड़ उम्मीदवारों पर खर्च हुए)। दशकों तक बंगाल पर राज करने वाली माकपा ने 8.23 करोड़ रुपये का खर्च दर्ज कराया। चुनाव परिणामों में, भाजपा ने 293 में से 207 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की, जबकि टीएमसी को 80, कांग्रेस को मात्र दो और माकपा को एक सीट मिली।


पांचों राज्यों के कुल योग को देखें तो कांग्रेस ने सामान्य प्रचार पर 143 करोड़ और उम्मीदवारों पर 105.55 करोड़ रुपये खर्च करते हुए कुल 248.55 करोड़ रुपये का व्यय दिखाया। वहीं, माकपा का कुल खर्च 39.04 करोड़ रुपये रहा। बंगाल और केरलम के अलावा भाजपा ने असम में 96.27 करोड़, तमिलनाडु में 51.56 करोड़ और पुडुचेरी में 11.90 करोड़ रुपये खर्च किए।

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