अपने मानस के सरोवर में श्रीराम का फूल खिलाना ही मानव जीवन की सफलता है : मारुति नंदन वागीश

मनुष्य के मानस रूपी सरोवर में जब श्रीराम नाम का फूल खिलने लगे तभी मनुष्य जीवन की सफलता है। लेकिन मनुष्य का मानस तामसी गुणों के प्रभाव में कलुषित हो जाता है और उसके मानस सरोवर में छल, छद्म, घृणा और द्वंद के बबूल उग आते हैं। समर्पण ट्रस्ट द्वारा विधान गार्डन परिसर में चल रही राम कथा के दौरान मारूति नंदन वागीश जी ने ये बातें कही।

उन्होंने कहा कि श्रीराम कथा हमें मर्यादा में रहना सिखाती है। साथ ही यह मानव का सही मार्गदर्शन भी करती है। जो मनुष्यङ सच्चे मन से श्रीराम कथा का श्रवण कर लेता है, उसका लोक ही नहीं परलोक भी सुधर जाता है। मनुष्य जीवन बहुत दुर्लभ है और बहुत सत्कर्मों के बाद ही मनुष्य का जीवन मिलता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को इसका सदुपयोग करना चाहिए और राम नाम का जप करते हुए अपने लोक व परलोक को सुधारना चाहिए। कलियुग में मनुष्य का सबसे बड़ा सहारा राम नाम ही है। प्रवचन के दौरान महाराज ने कहा कि हमें अपने दाम्पत्य जीवन में गंभीर होना चाहिए। पति-पत्नी, भाई- बहन, भाई-भाई का प्रेम, पिता-पुत्र, सास-बहु सभी को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए। रामायण हमें मर्यादा सिखाती है।

रामायण को प्रतिदिन श्रवण करने से मानसिक संतुलन ठीक रहता है। दुराचारी रावण की नकारात्मक सोच ने उसके पूरे कुल का विनाश कर दिया। जो मनुष्य तुलसीदल की शरण आएगा वह हर प्रकार के दल-दल से बच जाएगा। तुलसी की माला भगवान की पहचान है हमें गले में तुलसी की माला पहनना चाहिए। गले में तुलसी की माला और मुख में राम यही हमारे सकारात्मक भाव होना चाहिए।

उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि गुलाब का फूल दिखने में सुंदर है पर चखने में मीठा नहीं होता, गन्ना दिखने में सुंदर नहीं पर चखने में मीठा होता है। किंतु हमें अपना स्वभाव सुंदर और मीठा बनाना है तो भगवान राम की कथा कहना व सुनना चाहिए। इससे हमारा स्वभाव मधुर, मनोहर और मंगलकारी हो जाएगा। कथा सुनने के लिए सैकड़ों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
कथा के प्रारंभ में व्यासपीठ पर आसीन मारूति नंदन वागीश जी ने दीप प्रज्ज्वलित कर मंगलाचरण पाठ किया। तत्पश्चात कथा के मुख्य यजमान कुशल भारत समूह के कर्णधार नरेश अग्रवाल ने सपत्नीक व्यासपीठ और रामायण की पूजा-अर्चना की। समर्पण ट्रस्ट के ट्रस्टी नारायण प्रसाद डालमिया,  निरंजन कुमार अग्रवाल(एनके), प्रदीप ढेडिया व आशीष मित्तल ने वागीश जी का अभिनंदन किया। संचालन महावीर प्रसाद रावत ने किया।

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