- अनवार खान प्रातः काल एक्सप्रेस
भगवान श्रीराम के आदर्श और मां दुर्गा की शक्ति से प्रेरणा लेने का पर्व है दशहरा
रावण दहन तभी सार्थक, जब मनुष्य अपने भीतर की बुराइयों का करे अंत; सत्य, न्याय, साहस और सद्भाव अपनाने का संदेश देता है विजयादशमी का पर्व
प्रयागराज : भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में विजयादशमी का पर्व अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पावन पर्व नवरात्रि की नौ दिनों की आराधना के बाद उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। विजयादशमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन में सत्य, मर्यादा, कर्तव्य और नैतिकता को अपनाने की प्रेरणा देने वाला पर्व भी है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विजयादशमी का संबंध भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय से जुड़ा है। दोनों ही प्रसंग अन्याय, अत्याचार और अहंकार के अंत तथा धर्म और न्याय की स्थापना का संदेश देते हैं।
भगवान श्रीराम की विजय से मिलता है मर्यादा का संदेश
रामायण के अनुसार, लंकापति रावण ने माता सीता का हरण किया था। इसके बाद भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण, हनुमान और वानर सेना के सहयोग से लंका पर चढ़ाई की और रावण का वध कर माता सीता को मुक्त कराया। रावण विद्वान और शक्तिशाली होने के बावजूद अपने अहंकार तथा अधर्म के कारण पतन को प्राप्त हुआ।
भगवान श्रीराम का जीवन सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। शक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि निर्बलों की रक्षा और न्याय की स्थापना के लिए होना चाहिए। माता-पिता के प्रति सम्मान, वचनों का पालन, कर्तव्यनिष्ठा और मर्यादा का निर्वहन भगवान श्रीराम के जीवन के प्रमुख आदर्श हैं।
मां दुर्गा की विजय नारी शक्ति और साहस का प्रतीक
विजयादशमी का पर्व मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय से भी जुड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महिषासुर के अत्याचारों से संसार को मुक्त कराने के लिए मां दुर्गा ने युद्ध किया और अंततः उसका वध कर धर्म की स्थापना की।
यह प्रसंग नारी शक्ति, आत्मसम्मान, साहस और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संदेश देता है। मां दुर्गा की आराधना हमें प्रेरित करती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखें और अत्याचार के सामने हार न मानें। समाज में महिलाओं का सम्मान, उनकी सुरक्षा और समान अवसर सुनिश्चित करना भी इस संदेश की महत्वपूर्ण भावना है।
रावण दहन के साथ अपने भीतर की बुराइयों का भी करें अंत
दशहरे पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन बुराई के अंत का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इस परंपरा का वास्तविक संदेश केवल पुतले जलाने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य मनुष्य को अपने भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध, लालच, ईर्ष्या, मोह और नफरत जैसी बुराइयों को पहचानने तथा उन्हें दूर करने की प्रेरणा देना है।
रावण के दस सिरों को लोकप्रिय सांस्कृतिक व्याख्याओं में मानवीय कमजोरियों और नकारात्मक प्रवृत्तियों से जोड़कर भी देखा जाता है। यह प्रतीकात्मक संदेश देता है कि व्यक्ति कितना भी विद्वान, धनवान या शक्तिशाली क्यों न हो, यदि उसमें विनम्रता, विवेक और नैतिकता का अभाव है तो उसका पतन हो सकता है।
इसलिए सच्चा दशहरा तभी सार्थक होगा, जब व्यक्ति अपने व्यवहार में सुधार लाए, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करे और समाज में प्रेम, शांति तथा सद्भाव को बढ़ावा दे।
देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग परंपराओं से मनाया जाता है दशहरा
भारत की सांस्कृतिक विविधता विजयादशमी के पर्व में भी दिखाई देती है। उत्तर भारत में रामलीला और रावण दहन प्रमुख आकर्षण होते हैं। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के समापन पर मां दुर्गा की विदाई की जाती है। कर्नाटक में मैसूर दशहरा अपनी भव्यता और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है, जबकि हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में स्थानीय देवी-देवताओं की शोभायात्राओं के साथ दशहरा मनाया जाता है।
गुजरात में नवरात्रि के दौरान गरबा और डांडिया की परंपरा विशेष रूप से लोकप्रिय है। महाराष्ट्र में आपटा वृक्ष की पत्तियों का प्रतीकात्मक रूप से सोने के समान आदान-प्रदान किया जाता है। दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में विजयादशमी को विद्यारंभ और नई शिक्षा की शुरुआत के लिए शुभ माना जाता है।
ये परंपराएं दर्शाती हैं कि अलग-अलग रीति-रिवाजों के बावजूद सत्य, धर्म, साहस और मंगलकामना का भाव भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में बांधता है।
शिक्षा, शस्त्र पूजा और नई शुरुआत का भी है महत्व
विजयादशमी के अवसर पर कई स्थानों पर पुस्तकों, वाद्ययंत्रों, शस्त्रों और कार्य में उपयोग होने वाले औजारों की पूजा की जाती है। इसे ज्ञान, कौशल, कर्तव्य और आजीविका के साधनों के प्रति सम्मान के रूप में देखा जाता है।
कई लोग इस दिन नए व्यवसाय की शुरुआत करते हैं, विद्यार्थी नई विद्या या कौशल सीखने का संकल्प लेते हैं और परिवार सुख-समृद्धि की कामना के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। पर्व का संदेश है कि ज्ञान के साथ विनम्रता, शक्ति के साथ जिम्मेदारी और सफलता के साथ सेवा की भावना भी आवश्यक है।
समाज में सत्य, न्याय और सद्भाव स्थापित करना ही विजयादशमी की वास्तविक भावना
आज के समय में विजयादशमी का महत्व और भी बढ़ जाता है। समाज में नफरत, भेदभाव, अन्याय और स्वार्थ जैसी प्रवृत्तियों को समाप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्तर पर सकारात्मक प्रयास करने की आवश्यकता है। सत्य का साथ देना, कमजोरों की सहायता करना, महिलाओं का सम्मान करना, सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी बरतना और दूसरों के प्रति संवेदनशील रहना इस पर्व की शिक्षाओं को व्यवहार में उतारने के महत्वपूर्ण तरीके हैं।
भगवान श्रीराम के आदर्श मर्यादा और कर्तव्य का मार्ग दिखाते हैं, जबकि मां दुर्गा की विजय अन्याय के विरुद्ध साहसपूर्वक खड़े होने की प्रेरणा देती है। दोनों का मूल संदेश यही है कि शक्ति, ज्ञान और सामर्थ्य का उपयोग लोककल्याण के लिए होना चाहिए।
विजयादशमी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, सत्य, साहस और धर्म के मार्ग पर चलने वालों की विजय का विश्वास बनाए रखना चाहिए। इस पर्व पर अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लालच और नफरत को त्यागकर सत्य, न्याय, करुणा और सद्भाव अपनाने का संकल्प लेना ही दशहरे की भावना को सार्थक बनाता है।
















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