नवरात्रि में चौथे दिन देवी को कुष्मांडा के रूप में पूजा जाता है। सनातन सद्ग्रंथों के अनुसार अपनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन देवी को कुष्मांडा नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब इसी देवी ने अपने ईषत् हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसीलिए इन्हें सृष्टि की आदि स्वरूपा या आदि शक्ति कहा गया है।
मां कूष्मांडा की सच्चे मन से पूजा करने पर साधक के जीवन से दुख और कष्ट दूर हो जाते हैं।उनकी कृपा से रुके हुए कार्य भी शीघ्र पूरे हो जाते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मां कुष्मांडा का नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उनकी मुस्कान (कुशमंड) से ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना हुई थी। नवरात्रि के इस दिन व्रत रखने वाले भक्त पूर्ण फल प्राप्ति के लिए विशेष रूप से मां कुष्मांडा की कथा का पाठ करते हैं। चौथे दिन की पूजा में मंत्र, कथा श्रवण और दीप जलाने का विशेष महत्व होता है।
मां कूष्मांडा व्रत कथा : –
सनातन सद्ग्रंथों के अनुसार प्राचीन काल में त्रिदेव ने सृष्टि की रचना का संकल्प लिया, उस समय सम्पूर्ण ब्रह्मांड में घना अंधकार व्याप्त था, समस्त सृष्टि एकदम शांत थी, न कोई ध्वनि और ना आधार, केवल एक गहरा सन्नाटा था, इस स्थिति में त्रिदेव ने जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा से सहायता मांगी, जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा ने तुरंत ही ब्रह्मांड की रचना की, मां कूष्मांडा ने अपनी हल्की मुस्कान से सृष्टि का निर्माण किया, मां के चेहरे पर फैली मुस्कान से सम्पूर्ण ब्रह्मांड प्रकाशमय हो गया, इस प्रकार अपनी मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना करने के कारण जगत जननी आदिशक्ति को मां कूष्मांडा के नाम से जाना जाता है, मां की महिमा अद्वितीय है, मां का निवास स्थान सूर्य लोक है, शास्त्रों के अनुसार, मां कूष्मांडा सूर्य लोक में निवास करती हैं, ब्रह्मांड की सृष्टि करने वाली मां कुष्मांडा के मुखमंडल पर जो तेज है, वही सूर्य को प्रकाशवान बनाता है, मां सूर्य लोक के भीतर और बाहर हर स्थान पर निवास करने की क्षमता रखती हैं।
देवी पुराण के अनुसार मां कूष्मांडा की पूजा करने से व्यक्ति को स्वास्थ्य, धन और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है, साथ ही, मानसिक शांति और आत्मविश्वास भी बढ़ता है, इसी वजह से शारदीय नवरात्र के चौथे दिन भक्त पूरे श्रद्धा भाव से मां कूष्मांडा की आराधना करते हैं।
उपासना मंत्र :
रासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे।
जय जय माँ। जय माता रानी की।।
©तारकेश्वर मिश्र

















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