पितृ दोष का कारण और उसका निवारण

बहुत परिश्रम के बाद भी परेशानी है तो पितृदोष कारण हो सकता है


पितृपक्ष में पितरों को प्रसन्न करने वालों के कार्य सिद्ध होते हैं


श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) की शुरुआत 27 सितंबर 2026 (प्रतिपदा श्राद्ध) से हो रही है और इसका समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। सनातन परम्परा में इसे पितृदोष निवारण का शुभ अवसर मानते हैं।

सामान्य धारणा यह है कि जिनकी मृत्यु हो जाती है वह पितर बन जाते हैं। लेकिन गरूड़ पुराण से यह जानकारी मिलती है कि सामान्य जन की मृत्यु के पश्चात मृतक व्यक्ति की आत्मा प्रेत रूप में यमलोक की यात्रा शुरू करती है। सफर के दौरान संतान द्वारा प्रदान किये गये पिण्डों से प्रेत आत्मा को बल मिलता है। यमलोक में पहुंचने पर प्रेत आत्मा को अपने कर्म के अनुसार प्रेत योनी में ही रहना पड़ता है अथवा अन्य योनी प्राप्त होती है।


कुछ ही व्यक्ति अपने कर्मों से पुण्य अर्जित करके देव लोक एवं पितृ लोक में स्थान प्राप्त करते हैं यहां अपने योग्य शरीर मिलने तक ऐसी आत्माएं निवास करती हैं। सनातन सद्ग्रंथों में बताया गया है कि चन्द्रमा के ऊपर एक अन्य लोक है जो पितर लोक कहलाता है। शास्त्रों में पितरों को देवताओं के समान पूजनीय बताया गया है।


पितरों के दो रूप बताये गये हैं, देव पितर और मनुष्य पितर। देव पितर का काम न्याय करना है। यह मनुष्य एवं अन्य जीवों के कर्मो के अनुसार उनका न्याय करते हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि वह पितरों में अर्यमा नामक पितर हैं। यह कह कर श्री कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि पितर भी वही हैं। पितरों की पूजा करने से भगवान विष्णु की ही पूजा होती है।
विष्णु पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी के पृष्ठ भाग यानी पीठ से पितर उत्पन्न हुए। पितरों के उत्पन्न होने के बाद ब्रह्मा जी ने उस शरीर को त्याग दिया जिससे पितर उत्पन्न हुए थे। पितर को जन्म देने वाला शरीर संध्या बन गया, इसलिए पितर संध्या के समय शक्तिशाली होते हैं।


जानिए कौन होते हैं पितृ / पितर और उन्हें कैसे करें प्रसन्न
जब अंजाने में हम हमारे कुल के किसी पितृ या देवी, देवता की अनदेखी करते है या उन्हें सम्मान नही देते, किसी परिवार में आयोजित शुभ कार्यों पर उन्हें याद नहीं करते (जो उनका अधिकार है) तो वे हमसे नाराज हो जाते हैं और हमें पितृ दोष का सामना करना पड़ता है।
इस दोष से परिवार की सुख शांति खत्म हो जाती है। मानसिक, आर्थिक समस्याए उत्पन्न होने लगती हैं। हमारे पूर्वज, जो पितृ बन चुके हैं, हमसे केवल घर के बड़ो की तरह सिर्फ मान सम्मान के भूखे होते हैं। हमें कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि उनसे ही हम हैं। अर्थात हमारा यह शरीर हमारे पूर्वजों का ही परिवर्तित रूप है। इसलिए हमें उन्हें पूर्ण श्रद्दा से सम्मान देना चाहिए।
प्रत्येक मनुष्य के जीवन ये पांच ऋण चुकाने आवश्यक होते हैं:-
1. माता का ऋण
2. पिता का ऋण
3. गुरु का ऋण
4. घरती का ऋण
5. और देव(धर्म) का ऋण
जन्म के बाद इन बाध्यकारी होने जाने वाले ऋणों से यदि प्रयास पूर्वक मुक्ति प्राप्त न की जाए तो जीवन की प्राप्तियों का अर्थ अधूरा रह जाता है। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार इन दोषों से पीड़ित कुंडली शापित कुंडली कही जाती है। ऐसा व्यक्ति स्वाभाव वश अपने मातृपक्ष अर्थात माता के अतिरिक्त मामा-मामी, मौसा-मौसी, नाना-नानी तथा पितृ पक्ष अर्थात दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ ताई आदि को कष्ट व दुख देता है और उनकी अवहेलना व तिरस्कार करता है।


खगोलीय गति के कारण क्वार (आश्विन माह) कृष्ण पक्ष में पितृलोक पृथ्वी के नजदीक आ जाता है, जिससे पितृ गण श्राद्ध का पिंडदान ग्रहण आसानी से ग्रहण कर लेते हैं। पारिवारिक कष्ट, सन्तति कष्ट, प्रत्येक समय घर में रुग्णता रहना जैसी कई परेशानिया होती है पितृदोष के कारण।
इसके निराकरण के लिए
गया में पितरो के लिए पिंडदान(श्राद्ध) किया जाता है। जो गया न जा पाये वो घर पर भी पितरों हेतु श्राद्ध कर सकते हैं। श्राद्ध करने में भी जो सक्षम नहीं हैं वे पितरो के नाम से गंगा या अन्य तीर्थस्थलों में तर्पण कर सकते हैं।
लेकिन जीवन में एक बार अपने सभी पितरों के लिए गया में श्राद्ध सबके लिए समान रूप से अपरिहार्य है। स्वयं भगवान राम ने भी यह कार्य किया था।
एक और अनिवार्य बात यह है कि पितृपक्ष में अपवित्र वस्तुओ का सेवन कभी भी नहीं करना चहिये। मांसाहार, मादक पदार्थों का सेवन आदि का त्याग कर दम्पति को ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत करना चहिये।
ऐसी मान्यता है कि जिनके पितृ देव प्रसन्न रहते हैं, उनके घर में सदा ही शुभ कार्य संपन्न होते रहते हैं और उनका कोई भी अच्छा कार्य अधूरा नहीं रहता है।
©तारकेश्वर मिश्र

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