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राजनीतिक विश्लेषक इसके जवाब अलग-अलग तरीके से दे सकते हैं लेकिन यह बात सही है कि नॉर्थ ईस्ट में भाजपा की मजबूत पकड़ बनाने में हिमंत बिस्व सरमा का बड़ा रोल है। वर्तमान समय में देखे तो नॉर्थ ईस्ट में भाजपा के पास हिमंत बिस्व सरमा के रूप में बड़ा चेहरा उपलब्ध है।

हाल में ही 5 राज्यों में संपन्न हुए चुनाव में असम में भाजपा एक बार फिर से सत्ता में आने में कामयाब रही। हालांकि जैसे ही नतीजे भाजपा के पक्ष में गए, उसके बाद से यह सवाल लगातार उठ रहे थे कि आखिर भगवा पार्टी की ओर से असम की कमान किस को सौंपी जाएगी? भले ही पार्टी के तमाम बड़े नेता चाहे वह अमित शाह हो या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सर्बानंद सोनोवाल द्वारा असम में किए गए कार्यों की रैली में खूब जमकर सराहना करते थे पर उन्होंने यह खुलकर कभी नहीं कहा कि सर्वानंद सोनेवाल के ही नेतृत्व में आगे भाजपा की सरकार बनेगी। ऐसे में यह संभावनाएं पहले भी जताई जा रही थी कि कहीं ना कहीं असम में भाजपा मुख्यमंत्री के चेहरे को परिवर्तित कर सकती है और वैसा हुआ भी। भाजपा ने कांग्रेस से पार्टी में शामिल हुए हिमंत बिस्व सरमा को असम की कमान सौंपी। सर्बानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री के रेस में तो थे लेकिन वह हिमंत बिस्व सरमा से पिछड़ गए। हालांकि ऐसा कम ही मौका आया है जब भाजपा दूसरे दलों से आए नेताओं को पार्टी में शामिल करने के बाद उन्हें कोई बड़ा पद दे।

यह बात भी सच है कि पूर्वोत्तर में यह हुआ है। मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में ऐसा हो चुका है जब कांग्रेस से आए नेताओं को वहां की सत्ता सौंपी गई। मणिपुर में तो एन बिरेन सिंह कांग्रेस में रहते हुए भी मुख्यमंत्री थे और भाजपा में आने के बाद भी वे मुख्यमंत्री हैं। अरुणाचल में पेमा खांडू के नेतृत्व में पूरी की पूरी सरकार ही पलट गई। इन दोनों राज्यों में परिस्थितियां अलग थी। असम में सीटिंग सीएम को दूसरा कार्यकाल ना देकर हिमंत बिस्व सरमा को मुख्यमंत्री बनाया गया। यह अपने आप में थोड़ा मामला अलग है। हालांकि हिमंत बिस्व सरमा को असम की कमान सौंपकर भाजपा पूर्वोत्तर में खुद को मजबूत करने की दिशा में एक और कदम बढ़ा चुकी है। वैसे भाजपा हमेशा आरएसएस से जुड़े लोगों और अपने विचारधारा से जुड़े लोगों को ही ज्यादा महत्व देती रही है। याद करिए जब हरियाणा में भाजपा की सरकार बनी तो संघ के ही एक पूर्व प्रचारक मनोहर लाल खट्टर को वहां का मुख्यमंत्री बना दिया गया। यही स्थिति उत्तराखंड में देखने को मिली। उत्तराखंड में सतपाल महाराज और विजय बहुगुणा जैसे कई धाकड़ नेता मुख्यमंत्री की रेस में आगे चल रहे थे हालांकि यह दोनों कांग्रेस से आए थे। पार्टी की ओर से इन्हें मौका ना देकर त्रिवेंद्र सिंह रावत को सीएम बनाया गया। त्रिवेंद्र सिंह रावत बहुत पहले से संघ से जुड़े रहे हैं।

पिछले साल मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस से अलग होने के बाद सरकार गिरी तो वह भाजपा में शामिल हो गए। कांग्रेस ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस कदम को गलत बताती रही है और वह कहती रही है कि उन्हें भाजपा में वह सम्मान नहीं मिलेगा जो कांग्रेस में था। भाजपा के भी कई नेता यह कहते रहे हैं कि सिंधिया की राजशाही भाजपा में आने के साथ ही खत्म हो जाएगी। ऐसा देखने को भी मिला जब भाजपा की ओर से अपने पुराने नेताओं को ज्यादा महत्व दिया गया। सिंधिया को उतना नहीं दिया गया। भाजपा की ओर से सिंधिया को राज्यसभा सांसद बनाया जबकि उनके साथ आए नेताओं को शिवराज सरकार में मंत्री पद दी गई। लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया को बड़ी जिम्मेदारी अब तक नहीं मिल पाई है। लेकिन हिमंत बिस्व सरमा के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए उम्मीद जगी होगी। उन्हें इस बात आश्वासन जरूर हुआ होगा कि अगर पार्टी की मजबूती के लिए वह काम करते रहेंगे तो एक ना एक दिन उन्हें महत्वपूर्ण पद जरूर दी जाएगी। हर राज्य की अपनी अलग परिस्थितियां होती है और सभी तरह के समीकरणों को ध्यान में रखकर ही पार्टी की ओर से फैसला लिया जाता है लेकिन क्या इसका मतलब यह मान लिया जाए कि हिमंत बिस्व सरमा को असम का मुख्यमंत्री बनाना भाजपा के लिए मजबूरी थी?

राजनीतिक विश्लेषक इसके जवाब अलग-अलग तरीके से दे सकते हैं लेकिन यह बात सही है कि नॉर्थ ईस्ट में भाजपा की मजबूत पकड़ बनाने में हिमंत बिस्व सरमा का बड़ा रोल है। वर्तमान समय में देखे तो नॉर्थ ईस्ट में भाजपा के पास हिमंत बिस्व सरमा के रूप में बड़ा चेहरा उपलब्ध है। ऐसे में पार्टी की ओर से उन नेताओं को संदेश दिया गया है जो दूसरे दलों से भाजपा में शामिल होते हैं और उनके मन में इस बात की आशंका रहती है कि उन्हें बड़ा पद मिलेगा या नहीं मिलेगा। भाजपा का यह कदम राजस्थान में कांग्रेस से नाराज रहने वाले सचिन पायलट के लिए भी है जो पार्टी छोड़ते छोड़ते नहीं छोड़ पाए। हाल में ही हमने देखा कि पश्चिम बंगाल में किस तरह से तृणमूल कांग्रेस से आए नेताओं को पार्टी ने प्रमुख स्थान दिया। हालांकि वह चुनावी नफा नुकसान के लिए था। लेकिन चुनाव बाद ममता सरकार में नंबर दो रहे शुभेंदु अधिकारी को पार्टी ने बड़ा इनाम देते हुए नेता प्रतिपक्ष बनाया।

भगवा पार्टी की ओर से उठाए जाने वाले यह कदम विपक्ष के उन नेताओं के लिए बड़ा संदेश है जो अपनी पार्टी से असंतुष्ट हैं। भाजपा उन्हें यह बताने की कोशिश कर रही है कि उन नेताओं के लिए पार्टी का दरवाजा हमेशा खुला है। अगर वह भगवा दल में शामिल होते हैं और पार्टी की विचारधारा को आगे बढ़ाते हैं तो उन्हें प्रमोशन भी दिया जाएगा। भाजपा का यह कदम कांग्रेस शासित राज्यों के लिए भी हानिकारक साबित हो सकता है। कई कांग्रेस नेता जो अपनी पार्टी से नाराज चल रहे हैं उन्हें इस बात का संकेत मिलने शुरू हो गए होंगे कि भाजपा में भी उनका भविष्य है। अब देखना होगा कि दूसरे दलों से आए नेताओं को पार्टी किस तरह से एडजेस्ट करती है। लेकिन यह बात तो तय है कि अब भाजपा पहले कि भाजपा नहीं रही। समय और परिस्थितियों के अनुसार यह खुद को बदल रही है। संघ के साथ-साथ यह उन चेहरों को भी ज्यादा महत्व दे रही है जो उसकी विचारधारा से तो नहीं जुड़े थे लेकिन उसकी विचारधारा को बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं।

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