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ब्रह्म यज्ञ सबसे पहला यज्ञ माना जाता है। मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है, किंतु इनमें पितृ अर्थात माता-पिता का स्थान सबसे ऊपर है। पितरों से बढ़कर देवताओं को माना जाता है, जिसमें प्रकृति और दूसरे देवी देवता माने जाते हैं।

मानव जीवन में यज्ञ को सर्वश्रेष्ठ कर्म माना गया है। प्राचीन हिंदू सनातन परंपरा से आधुनिक युग तक यज्ञ मनुष्य के जीवन का अभिन्न अंग रहे हैं। हिन्दू समाज में अगर घर में कोई भी शुभ कार्य हो उसमें यज्ञ का होना अनिवार्य है। ऐसे में चाहे सामान्य पूजा पाठ हो, गृह प्रवेश हो या फिर बच्चे का नामकरण संस्कार हो, या शादी-विवाह जैसी महत्वपूर्ण परंपरा ही क्यों ना हो, यज्ञ बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि यज्ञ कितने प्रकार के होते हैं?

आइए, अगर आपने नहीं सोचा है, तो आपको बताते हैं यज्ञ कितने प्रकार के होते हैं। 

मुख्य रूप से यज्ञ पांच प्रकार के बताए गए हैं और इनका वर्णन हिंदू पौराणिक ग्रंथों में भी लिखा मिलता है।

ब्रह्म यज्ञ

यह सबसे पहला यज्ञ माना जाता है। मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है, किंतु इनमें पितृ अर्थात माता-पिता का स्थान सबसे ऊपर है। पितरों से बढ़कर देवताओं को माना जाता है, जिसमें प्रकृति और दूसरे देवी देवता माने जाते हैं। इन से भी बढ़कर ईश्वर और ऋषियों को माना जाता है। ईश्वर को ही ब्रह्म कहा जाता है और ब्रह्म यज्ञ उन्हीं को अर्पित होता है। कहते हैं कि नित्य संध्या-वंदन और स्वाध्याय के साथ वेद-पाठ करने से ऋषियों का ऋण चुक जाता है।

देव यज्ञ

सत्संग के साथ अग्निहोत्र कर्म से इसे संपन्न किया जा सकता है। कहते हैं कि यज्ञ वेदी में अग्नि जलाकर होम करने से अग्निहोत्र यज्ञ संपन्न किया जाता है। संधिकाल में गायत्री छंद के साथ इस यज्ञ को किया जाता है और इससे देव ऋण चुकाया जाता है।

घर में होने वाले तमाम यज्ञ को देव यज्ञ की ही श्रेणी में रखा जाता है। इस यज्ञ को संपन्न करने में 7 पेड़ों की लकड़ियां लगती हैं, जिसमें आम, बड़, पीपल, ढाक, जांटी, जामुन और शमी प्रयोग की जाती हैं। इस यज्ञ-हवन से पॉजिटिविटी बढ़ती है, तथा रोग शोक नष्ट होते हैं। इस यज्ञ से गृहस्थ आश्रम में शुभ फल प्राप्त होता है।

पितृ यज्ञ

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है और श्रद्धा से किए गए और सत्य भाव के साथ किए गए कर्म, जिनसे माता-पिता और आचार्य तृप्त होते हैं, उसे ही पितृ यज्ञ कहा जाता है। वेदों के अनुसार, श्राद्ध-तर्पण हमारे पूर्वजों को अर्पित किया जाता है। 

संतान की उत्पत्ति और उनका लाभ धारण करने से पितृ ऋण चुकता होता है, और इसे ही पितृ यज्ञ कहा जाता है।

वैश्व देवयज्ञ

वैश्व देवयज्ञ, जिसे ‘भूत’ यज्ञ भी कहा जाता है। ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ पंच तत्व से बना शरीरा। हमें पता ही है किइन पांच महाभूतों से हमारा शरीर बना होता है और इन्हीं के लिए यह यज्ञ किया जाता है। बता दें कि भोजन करते समय कुछ अंश अग्नि में डाला जाता है और तत्पश्चात कुछ गाय, कुत्ते और कौवे को दिया जाता है वेदों पुराणों में इसे ही ‘भूत यज्ञ’ कहा गया है।

अतिथि यज्ञ

हमारे देश में ‘अतिथि देवो भव’ की परंपरा बेहद प्राचीन रही है। मेहमानों की सेवा करना, उन्हें अन्न-जल से संतुष्ट करना, साथ ही किसी जरूरतमंद महिला, विद्या प्राप्त करने वाला युवक, चिकित्सक इत्यादि की सेवा करना ही अतिथि यज्ञ की श्रेणी में आता है। गृहस्थ आश्रम में सर्वश्रेष्ठ सेवा ‘नर सेवा नारायण सेवा’ को ही बताया गया है और ‘अतिथि-यज्ञ’ इसी श्रेणी में आता है।

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