Sun. Jun 20th, 2021

बालि यहाँ एक बात और कह रहा है, वह यह कि हे नाथ! वैसे तो आपने मुझे इतना दे दिया कि इतना तो मेरी सामर्थ्य व पात्रता ही नहीं थी और अब मैं आपसे कुछ माँगू तो यह मेरी धृष्टता ही होगी, परन्तु तब भी मैं यह धृष्टता अवश्य करूँगा।

आश्चर्य की सीमा नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार की आध्यात्मिक उन्नति की छलाँग बालि ने लगाई, उसे लगाने में बड़े-बड़े योगी जन भी असमर्थ सिद्ध हुए हैं। यही चातुर्य का सदुपयोग है। जिस चतुराई से चतुर्भुज मिले, भला ऐसी चतुराई में क्या हानि। चातुर्य तो वहाँ विनाश का कारण बनता है, जहाँ किसी व्यक्ति अथवा समाज का अहित छुपा होता है। बालि को भगवान श्रीराम की दिव्य छवि पर इतना प्यार आ रहा है कि वह अवश्यंभावी मृत्यु को तो मानो खेल-सा ही मान रहा है। वास्तविक्ता तो कह ही रही है कि हे बालि! देख, तेरी मृत्यु तेरे समक्ष है। काल तुझे अब छोड़ने वाला नहीं। बालि भी मानो सब सुन तो रहा है परन्तु उसके मुख पर भय के चिन्ह नहीं अपितु एक सिंहनाद है, कि हे काल! माना कि तूं मृत्यु का देवता है। समस्त संसार तुझसे थर-थर काँपता है। लेकिन क्या तुम इस सत्य से सचमुच अनभिज्ञ हो कि जिसके स्वामी स्वयं साक्षात महाकाल हों, भला उसे किसी से डर कर घबराने की क्या आवश्यक्ता है? सचमुच बालि ऐसा ही निर्भीक बना हुआ था। श्रीराम जी की आँखों में तो अश्रुयों की अनवरत धारा रुकने का नाम ही नहीं ले रही और बालि है कि उसके मुख पर अभी भी मुस्कान है। लग ही नहीं रहा कि बालि मृत्यु का सामना कर रहा था।

यह सही भी था, क्योंकि ऐसा तो था नहीं कि यह कोई बालि के पुण्य प्रतापों का फल था। यह तो बस एक संयोग-सा था कि प्रभु ने आज कृपा करनी ही थी और बालि का सौभाग्य रहा कि आज वह प्रभु के सामने आन पड़ा। मानों बालि की तो लॉटरी लगी थी। लॉटरी का गणित तो आप जानते ही हैं, कि बिन ही प्रयास के जब आपकी झोली में कल्पना से भी अधिक भर जाये तो यह मौका भला कौन अपने हाथों से जाने देता है? फिर पता नहीं यह संयोग कब बने। क्योंकि बंजर खेत में खेती की भला कौन-सी सीमा व कौन-सी अवधि? कारण कि वहाँ पर बारिश कोई ऋतु के अधीन थोड़ी होती है। अपितु वहाँ तो मेघों का बरसना ही निर्धारित करता है, कि आपके घर दाने आएँगे कि नहीं। भूले भटके अगर मेघ बरस पड़े समझना चाहिए कि यह निश्चित ही ईश्वर की ही महती कृपा हुई है। और इस कृपा को केवल ‘संयोग’ का संबोधन ही दिया जा सकता है। गोस्वामी जी कहते हैं- 

‘मम लोचन गोचर सोई आवा।

बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा।।

बालि यहाँ एक बात और कह रहा है, वह यह कि हे नाथ! वैसे तो आपने मुझे इतना दे दिया कि इतना तो मेरी सामर्थ्य व पात्रता ही नहीं थी और अब मैं आपसे कुछ माँगू तो यह मेरी धृष्टता ही होगी, परन्तु तब भी मैं यह धृष्टता अवश्य करूँगा। क्योंकि पता नहीं फिर यह संयोग कभी बने अथवा न बने। जैसा कि मैं देख पा रहा हूँ, कि आप मुझ पर अथाह स्नेह व दुलार लुटा रहे हैं। और कोई वरदान न्यौछावर करने हेतु दृढ़ संकल्पित भी प्रतीत हो रहे हैं। और मुझे तो बहुत अच्छे से आभास है कि ‘अब के चुके चूक है फिर पछतावा रह जाये।’ तो हे नाथ! कृपया मेरी आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि मुझे बड़ा भारी दुख है, कि मैं इस तन से तो आपकी सेवा व अर्चना नहीं कर पाया। लेकिन मैं चाहता हूँ कि मेरी मृत्यु के पश्चात भी मैं आपकी सेवा में निरंतर अपना योगदान देता रहूँ। श्रीराम जी ने कहा कि हे बालि! मैं भी तो यही चाहता हूं कि तुम भी और वानरों की तरह मेरी सेवा में लगो। परन्तु यह तभी तो संभव है न जब आप अपने प्राणों का संरक्षण करेंगे। इसलिए बार-बार मृत्यु के वरण की हठ आप छोड़ दें और पुनः अपनी गदा उठा कर मेरे संग अर्धम के विरुद्ध खड़े हो जाएँ। यह सुन बालि मुस्करा पड़ा, और बोला कि हे प्रभु! मैं भला हठी कहाँ, हठी तो आप प्रतीत हो रहे हैं, तभी मुझे बार बार प्राणों के रक्षण की ओर प्रेरित कर रहे हैं। जबकि निश्चित ही मेरा आपसे ऐसा आग्रह नहीं कि मैं जीवित रहकर आपकी सेवा का आग्रह कर रहा था। आग्रह यह कि आप सर्वप्रथम मुझ पर ऐसी दया कीजिए कि कर्म भोग के चलते मैं जिस भी योनि में जाऊँ उसी योनि में ही मैं आपकी भक्ति में अनुरक्त रहूँ- 

अब नाथ करि करुना बिलोकहु, देहु जो बर मागऊँ।         

जेहि जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ।।

यह तो मेरी माँग थी कि मृत्यु पश्चात प्राप्त जन्म में मुझे क्या मिले? अब मेरी दूसरी माँग इसी जन्म से संबंधित है। वास्तव में मेरी ही तरह बलवान व विनयप्रद कोई और भी है, जो मेरी ही परछाईं है, मेरा अंश है, मेरा पुत्र है। जिसे आप व संसार महाबलि वीर अंगद के नाम से जानते हैं। हे प्रभु! मेरी आपसे हाथ जोड़ कर विनती है कि आप इसकी बाँह थाम लीजिए। यह आपके लिए हर प्रकार से सहायक होगा। मरते-मरते कम से कम यह तों संतोष रहेगा कि मैं नहीं तो मेरा अंश सही। वीर अंगद को मैंने आपकी सेवा में लगाने का अगर आग्रह किया है तो इसके पीछे विशेष कारण है। कारण यह है कि वीर अंगद, भले ही मेरे ही समान बलशालि है, लेकिन अंगद में मेरी तरह अहंकार किंचित मात्र भी नहीं है। मैं जैसे मद में चूर रहता था, वैसे तो अंगद है ही नहीं। अपितु विनय इसके हृदय में कूट-कूटकर भरी है। मैं निश्चित भाव से कह सकता हूँ कि वीर अंगद अपने प्राण त्याग देगा परन्तु कभी आपको पीठ दिखाकर भागेगा नहीं-

यह तनय मम सम बिनय बल, कल्यानप्रद प्रभु लीजिये।

गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिये।।

और इतना कहकर बालि ने अपने शरीर से प्राण त्याग दिये। प्राण त्यागते समय बालि के मुख पर किंचित भी कोई मलाल नहीं था। न कोई दुख न कोई कष्ट। बालि को प्राण निकलने का कण मात्र भी अहसास न हुआ। मानो हाथी के कंठ से माला गिरी हो। और यह तो हम जानते ही हैं कि हाथी के कंठ से जब माला गिरती है तो उसे किंचित भी भान नहीं होता। बालि के साथ भी ठीक यही हुआ। 

राम चरन द्दढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग।

सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग।।

आने वाले अंक में हमें प्रभु की महिमा के कौन-से पक्ष का दर्शन होगा। जानने के लिए पढ़ते रहिएगा ज्ञान गंगा—(क्रमशः)—जय श्रीराम

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