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कलमी काटकर खाया जाता है व बीजू चूस कर। आम ग्रीष्म प्रधान देश का ही फल है। ठंडे प्रदेशों में यह नहीं उगता। सारे भारत में इसके वृक्ष लगाए जाते हैं, जो कि काफी फलते-फूलते हैं। यह एक छायादार वृक्ष है। फरवरी माह में इसमें फूल आते हैं, तथा मार्च अप्रैल महीने में फूलों के गुच्छों से पेड़ भर जाते हैं। इन्हें आम का बौर कहा जाता है।

आम का नाम सुनते ही हमारी आँखों के सामने पीले-पीले, चटकीले, रसीले, सब के मनपसंद आम की आकृति नाचने लगती है। शायद कोई बिरला ही होगा जिसे आम पसंद न हों। यूं तो आम की अनेकों प्रजातियां होती हैं लेकिन मुख्यतः दो ही प्रयुक्त होती हैं-कलमी और बीजू। कलमी काटकर खाया जाता है व बीजू चूस कर। आम ग्रीष्म प्रधान देश का ही फल है। ठंडे प्रदेशों में यह नहीं उगता। सारे भारत में इसके वृक्ष लगाए जाते हैं, जो कि काफी फलते-फूलते हैं। यह एक छायादार वृक्ष है। फरवरी माह में इसमें फूल आते हैं, तथा मार्च अप्रैल महीने में फूलों के गुच्छों से पेड़ भर जाते हैं। इन्हें आम का बौर कहा जाता है। जब आम बौरने लगता है, तो उसके कोमल पत्तों और मंजरी पर एक विशेष प्रकार का चिपचिपा पदार्थ लगा रहता है। जिसमें एक खास प्रकार की मीठी सी गंध आती है। चैत्र महीने में बौर झड़ने लगता है और सरसों के बराबर फल लगने शुरू हो जाते हैं। कच्चे फलों को कैरी कहते हैं। पकने पर फल पीले रंग के हो जाते हैं। आयुर्वेद में आम को हृद्य कहा जाता है। जो वस्तुएँ हृदय को बल प्रदान करती हैं, उन्हें ‘हृद्य’ कहा जाता है। ये वस्तुएँ हृदय में रहने वाले ओज और अवलम्बक-कफ को बढ़ाती हैं। उनसे हृदय को स्थाई शक्ति मिलती है व हृदयगति में स्थिरता आती है। आम भी शीत वीर्य का होता है। आयुर्वेदिक ग्रन्थों में इसका उल्लेख इस प्रकार मिलता है-

हृद्यं वर्णकारं रुच्यं (सुश्रुत)

गुरु वातहरं हृद्यं (भाव प्रकाश)

इससे सिद्ध होता है कि आयुर्वेद के मतानुसार आम हृदय के लिए गुणकारी है। यहाँ तक कि आम की गुठली भी हृदय की जलन को शांत करती है। भाव प्रकाश में इसके बारे में लिखा गया है-‘हृदयदाहनुत’। पके आम फल में बैंजोल, गैलिक एसिड, सिट्रिक ऐसिड इत्यादि पाए जाते हैं। इसकी छाल में टैनिन होता है। बीज मज्जा में गैलिक एसिड, टैनिक एसिड व प्रचूर मात्र में स्टार्च पाया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार आम लघु (हलका) और रूक्ष (रूखा) गुण युक्त होता है। रस में कषाय (कसैला), विपाक में कटु और वीर्य में शीत होता है। पका फल गुरु-स्निग्ध, मधुर एवं कच्चा फल अम्ल माने खट्टा होता है। इसकी छाल,पत्ते, फूल, बीज-मज्जा यानि गुठली के अंदर पाई जाने वाली मींगी कफ, पित्तशामक व रक्त रोधक होती हैं। पका फल वातपित्त शामक और कच्चा फल त्रिदोष कारक होता है। कच्चा फल रोचक (रुचिकारक) और भूख बढ़ाने वाला होता है। पका फल स्नेहन, अनुलोमन तथा सारक होता है। पत्तों में वमन रोकने वाला गुण भी होता है। बीज मज्जा कीट नाशक होती है। 

औषधीय प्रयोग में रक्त स्राव एवं व्रण (घाव) इत्यादि में बाह्य प्रयोग के लिए छाल, पुष्प, पत्र तथा बीज मज्जा का चूर्ण लगाया जाता है। लू लगने पर तथा जलन होने पर कच्चे फल को आग में पकाकर त्वचा पर लगाते हैं। वमन को रोकने के लिए पत्तों का रस देते हैं। अतिसार (दस्त लगना) तथा पेचिश में फूल, छाल तथा बीज मज्जा यानि गुठली की मींगी का प्रयोग करते हैं। कृमिरोग यानि पेट में कीड़े पड़ जाने पर बीज मज्जा का चूर्ण खिलाया जाता है। हृदय रोग, खून की कमी, रक्तपित्त में पका फल देते हैं। रक्त प्रदर, श्वेत प्रदर में बीज मज्जा प्रयुक्त होती है। पूयमेह यानि सूजन में पत्तों का जूस निकाल कर दिया जाता है। लू लगने पर कच्चे फल को आग में पकाकर पानक बना कर पिलाते हैं। दौर्बल्य (कमजोरी) तथा कृशता (दुबलापन) में पका आम खिलाया जाता है। आम खाने में सावधानियां-कच्चा फल अधिक खाने से नेत्र विकार हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य विकार जैसे, मन्दाग्नि, रक्तविकार वबन्ध, विषम ज्वर इत्यादि होने पर सौंठ का चूर्ण पानी के साथ या जीरे का चूर्ण काले नमक के साथ देने से लाभ होता है। प्रयोज्य अंग-आम के सभी अंग जैसे छाल, पत्र, पुष्प, फल, बीज मज्जा इत्यादि प्रयोग में लाए जाते हैं। 

विशिष्ट योग-पुष्यानुग चूर्ण। 

आम के कुछ अन्य प्रयोग-

1. खूनी पेचिश में आम की छाल का काढ़ा बनाकर 14 मि-ली दिन में तीन बार लें। 

2. इसके तने की छाल या जड़ की छाल का चूर्ण शहद या बकरी के दूध के साथ 6 ग्राम की मात्र में लेने से दस्त में खून आना बंद हो जाता है। 

3. खूनी बवासीर तथा रक्त प्रदर में आम के पत्तों का रस निकालकर 14 से 28 मि-ली शहद में मिलाकर दिन में तीन बार देने से बहुत लाभ होता है। इसके ऊपर से दूध का सेवन करें। 

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