प्रवासी मजदूर

प्रवासी मजदूर

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आधा यूपी बिहार प्रवासी है,ये दुर्गति जो आज हो रही है वो उसे डिसर्व करता है शायद,मेट्रो शहरों से गाँव आना अपनी बिरादरी वाले को वोट देना और फिर उसी शहर को लौट जाना,जो गरीब है वो मेहनत मजदूरी को बाहर भागता है,मिडिल क्लास बीटेक एमबीए करके भागता है,यहाँ के लोगों की जरूरत ही ऐसी हो चली है कि बाकी राज्यवासियों की तरह इनमें क्षेत्रवाद की भावना बहुत दुर्बल है,ये सर्वत्र पाए जाने वाले लोग हैं,इनके अपने नेताओं ने सत्तर सालों में इनके वोट के गुदे चूस-चूस के गुठली की तरह फेंक दिया है,रोजगार के नाम पे सत्ता में आते ही थोक के भाव विज्ञापन और अगले चुनाव से ठीक पहले प्रतियोगी परीक्षाएं कराने का ट्रेंड चलता है,कुटीर उद्योग लालफीताशाही की भेंट चढ़ गए और खर्चा इतना बढ़ गया कि दाम प्रतिस्पर्धा के बाजार में टिक ही न पाएं,भ्रस्टाचार को लोगों ने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया,दहेज ने रही सही नैतिकता के द्वार बंद कर दिए,गाँव की स्थानीय गणित इतनी खतरनाक है कि पढ़ा लिखा आदमी भी तटस्थ नहीं रह सकता,फलाने फलाने के कब मित्र बन जाएं और कब खून के प्यासे कुछ पता नहीं,पढ़ा लिखा नौजवान वापस लौट के कुछ काम भी करना चाहे तो गाँव कस्बे के मठाधीश पहले ये कह के उसका उपहास उड़ाएंगे की बाहर बबुआ की दाल न गली साथ और कंधा देने की बजाय उसके राह में खुद रोड़ा बन जाएंगे,बिरादरियों ने आपस मे किसी को कुछ न दिया सिवाय बुशर्ट की दो बटन खोल के दूसरी बिरादरी के मोहल्ले में चौड़ा होकर चलने के कि देखो परधानी हमारी है बेट्टा बिधैकी अपनी है बॉस,जीवन के जिस दौर में बूढ़े माँ बाप को बच्चों की जरूरत होती है,या छोटे बच्चों को स्कूल से आने के बाद बाप की जरूरत होती है,उस वक्त मुरहुआ सूरत में साड़ी रंग रहा है,मुरहुआ के गाँव मोहल्ले वालों को लगता है कि गुरु मुरहुआ साड़ी नहीं नोट छाप रहा,उधर शहर की किसी झोली में मुरहुआ हर रात सोने से पहले ये सोचता है कि काश ऐसा कोई कारखाना अपने गाँव के बगल किसी कस्बे में भी होता,दो पैसे कम ही मिलते रोज शाम को बच्चों के लिए टाफी खरीद के ले जाता लुगाई के लिए आलू की टिकिया बाप की दवाई और सो जाता है,पोस्ट कोविड दुनिया मे MSME पे जोर रहेगा,गाँधी को एक विचारक के रूप में आप पसंद करें न करें पर गाँधी के आर्थिक विकास के मॉडल में एक सोंधी सी खुश्बू है,कोई अपने ही देश मे परदेसी क्यों हो,रेलगाड़ियों में पैखाने तक पैर भी रखने की जगह क्यों न हो..? कोई बाहर बेबस होके न निकले शौक से निकले..!!!

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