चीन सीमा पर ध्यान देंगे नए आर्मी चीफ, जानें- ड्रैगन से किन 6 मामलो को सुलझाना है जरूरी

चीन सीमा पर ध्यान देंगे नए आर्मी चीफ, जानें- ड्रैगन से किन 6 मामलो को सुलझाना है जरूरी

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नए आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकंद नरवणे ने चीन से जुड़ी सीमा पर फोकस बढ़ाए जाने की बात कही है। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना लंबे समय से पश्चिमी सीमा यानी पाकिस्तान से लगे बॉर्डर पर निगरानी करती रही है, लेकिन अब चीन सीमा पर भी फोकस किए जाने की जरूरत है। चीन से तनाव के सवाल पर उन्होंने कहा कि सीमा पर शांति के लिए हमारी ओर से लगातार प्रयास जारी हैं। हालांकि बता दें कि भारत का चीन से 6 अहम मुद्‌दों पर तनाव हैभारत और चीन के बीच सीमा को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। दोनों देश करीब 4,062 किमी की सीमा साझा करते हैं। चीन से भारत की सीमा पांच राज्यों से जुड़ती है। इनमें जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश शामिल हैं।

भारत व चीन के बीच तिब्बत, राजनीतिक व भौगोलिक तौर पर बफर का काम करता था। चीन ने 1950 में इसे हटा दिया। भारत तिब्बत को मान्यता दे चुका है, लेकिन तिब्बती शरणार्थियों के बहाने चीन इस मसले पर आपत्तियां दर्ज करवाता रहता है। भारत ने अरुणाचल प्रदेश में उसकी 90 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन दबा ली है। भारत इसे अपना हिस्सा बताता है। अरुणाचल को विवादित बताने के लिए चीन वहां के निवासियों को स्टेपल वीजा भी देता है। पाक अधिकृत कश्मीर और गिलगित बालटिस्तान में चीनी गतिविधियां तेज हुई हैं। कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया जा चुका है कि इन इलाकों में तीन से चार हजार चीनी तैनात हैं, लद्दाख में यह सड़क बनाकर चीन ने विवाद का एक और मामला खड़ा किया है। चीन जम्मू-कश्मीर को भारत का अंग मानने में आनाकानी करता है, लेकिन पाक के कब्जे वाले कश्मीर को पाकिस्तान का भाग मानने में उसे कोई आपत्ति नहीं है। चीन ने पिछले कुछ वर्षों में हिंद महासागर में अपनी गतिविधियां काफी बढ़ा दी हैं। पाकिस्तान, म्यांमार व श्रीलंका के साथ साझेदारी में परियोजनाएं शुरू कर वह भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है। अपनी ऊर्जा की जरूरतों को ध्यान में रख चीन साउथ चाइना सी इलाके में अपना प्रभुत्व कायम करने की कोशिशें कर रहा है। यहां उसे वियतनाम, जापान और फिलिपींस से चुनौती मिल रही है। चीन कई बार भारत को इस मसले पर दूर रहने को भी कह चुका है। 

कई बार नेपाल ने भारत के ट्रकों को व्यापार के लिए रोक दिया था। नेपाल और भूटान के बीच का संबंध भी भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। दोनों देशों के बीच शरणार्थियों को लेकर कड़वाहट भरे संबंध रहे हैं। भूटान ने हजारों की संख्या में नेपाली शरणार्थियों को निकाला है जो अब भी शरणार्थी कैंप में रह रहे हैं। विशेषज्ञों की मानें तो नेपाल नहीं चाहता है कि भारत और भूटान के संबध अच्छे हों। 

मैकमोहन लाइन का विवाद भी है बड़ा
साल 1914 में शिमला में एक सम्मेलन हुआ। इस कॉन्फ्रेंस में सीमा से जुड़े कुछ अहम फैसले हुए। तब ब्रिटेन के भारतीय साम्राज्य में सर हेनरी मैकमहोन विदेश सचिव थे। उन्होंने ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के बीच एक 890 किमी लंबी सीमा खींचीं। फॉरेन सेक्रेटरी के नाम की वजह से सीमारेखा को मैकमहोन लाइन नाम मिल गया। इसमें तवांग (अरुणाचल प्रदेश) को ब्रिटिश भारत का हिस्सा माना गया। इस सम्मेलन में मानचित्र का कोई लिखित रेकॉर्ड नहीं रखा गया। बस एक मैप पर लाइनों के सहारे आउटर तिब्बत को इनर तिब्बत और इनर तिब्बत को चीन से अलग कर दिया गया। इसमें दो मानचित्र आए। पहला वाला 27 अप्रैल, 1914 को आया, जिस पर चीन के प्रतिनिधि ने दस्तखत कर दिए। जबकि दूसरा 3 जुलाई, 1914 को आया। ये एक डिटेल्ड मैप था। इस पर चीन ने साइन करने से मना कर दिया। चीन कहता है कि मैकमहोन लाइन के बारे में उसको बताया ही नहीं गया था। उससे बस इनर और आउटर तिब्बत बनाने के प्रस्ताव पर बात की गई थी। 1949 में भारत और भूटान के बीच जो फ्रेंडशिप समझौता हुआ था उसमें 2007 में संशोधन किया गया था। संशोधन से पहले इस समझौते में था कि भूटान सभी तरह के विदेशी संबंधों के मामले में भारत को सूचित करेगा। संशोधन के बाद इसमें जोड़ा गया कि जिन विदेशी मामलों में भारत सीधे तौर पर जुड़ा होगा उन्हीं में उसे सूचित किया जाएगा। भारत और भूटान के बीच की यह संधि चीन को खटकती रही है। चीन और भूटान के बीच पश्चिम और उत्तर में करीब 470 किमी लंबी सीमा है। 

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