भूकंप के साथ जीना

भूकंप के साथ जीना

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देश-दुनिया के भूगर्भीय अध्ययन और भूकंप के पुराने अनुभवों के आधार पर वैज्ञानिक मानते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में बड़ी शक्ति के भूकंप आ सकते हैं। हाल ही में संपन्न देश के भूकंप विज्ञानियों के राष्ट्रीय सम्मेलन में चिंता जतायी गई कि हमने अतीत की घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा। जरूरत इस बात की है कि देश भूकंप संबंधी सुरक्षा सुनिश्चित करे। इसके अंतर्गत सार्वजनिक व निजी निर्माण का भूकंपरोधी होना तथा बचाव व राहत के लिये तंत्र विकसित किया जाये। नि:संदेह जापान जैसे देशों ने भूकंप के साथ जीना सीख लिया है। उन्होंने निर्माण की गुणवत्ता के अलावा मानसिक रूप से भूकंप से जूझने की समझ विकसित कर ली है। दरअसल, मनुष्य को भूकंप नहीं मारता, उसे गरीबी मारती है। अवैज्ञानिक तरीके से बनाये गये चलताऊ किस्म के निर्माण जानलेवा साबित होते हैं। वर्ष 1993 में महाराष्ट्र, लातूर में आये भूकंप में नौ हजार लोगों की मृत्यु की मुख्य वजह कच्चे मकान ही थे।

दरअसल, जहां देश में भूकंपरोधी आवासीय संस्कृति की पर्याप्त जानकारी आम लोगों को मुहैया नहीं करायी जाती वहीं गरीबी भी इस समस्या की जटिलता को बढ़ाती है। दूसरी ओर बिल्डर जो बहुमंजिली इमारतें बना रहे हैं, उनमें भूकंपरोधी तकनीकों का इस्तेमाल हुआ है कि नहीं, यह जांचने वाले विभाग पड़ताल नहीं करते। लोगों की प्राथमिकता कीमत का भाव-मोल होता है, बजाय कि सुरक्षा मानकों की कसौटी। आंकड़े बताते हैं कि गुजरात में 2001 के भुज केंद्रित भूकंप के चलते अहमदाबाद में 120 बहुमंजिला इमारतें ढह गई थीं और नौ सौ लोग मारे गये थे। क्या  उन बिल्डरों की जवाबदेही तय करके उन्हें दंडित किया गया? हालांकि, देश के भूकंप शोध संस्थान व आईआईटी अनुसंधानरत हैं कि भूकंप की पूर्व चेतावनी देना वाला तंत्र विकसित किया जाये, मगर फिलहाल ऐसी सटीक जानकारी देना संभव नहीं है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हम ऐसा समाज बनायें, जिसने भूकंप से उत्पन्न परिस्थितियों से जूझने की मानसिक व सुरक्षात्मक तैयारी कर रखी होगी। आपातकालीन परिस्थितियों में चिकित्सा व प्रभावित स्थलों तक राहत पहुंचाने की कारगर व्यवस्था की जाये। सही मायनो में भूकंप संबंधी सुरक्षा हर नागरिक का अधिकार होना चाहिए। जिसके लिये केंद्र व राज्य सरकारों के अलावा राहत-बचाव करने वाले संस्थानों में बेहतर तालमेल जरूरी है।

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