ढाई आखर का मर्म भी समझिए

ढाई आखर का मर्म भी समझिए

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प्रेम के सम्बंध में स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि प्रेम समय, स्थान और सीमा से परे है। यह भी माना जाता है कि सच्चा प्रेम वही होता है जहां त्याग होता है। या त्याग में ही प्रेम की पराकाष्ठा के प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर होते हैं। दरअसल, आज प्रेम के शब्दार्थ को बहुत ही संकुचित कर दिया गया है जबकि इसकी व्यापकता अनंत है। आनंद जन्म में नहीं, जीवन में है और जीवन प्रेम में है। असलियत तो यह है कि युगों-युगों से संत-महात्मा मानव को मानव मात्र से प्रेम करने की शिक्षा दे रहे हैं। प्रेम चाहे वह किसी किसी भी युग में, किसी भी स्तर पर और किसी भी समय या स्थान पर किया जाये, वह शांति ही प्रदान करेगा।

जीवन में प्रेम के कई रूप सामने आते हैं, वह चाहे स्त्री-पुरुष का हो, पति-पत्नी का हो या फिर वह मां-बाप का हो, या वह रिश्तेदारों या अन्य किसी का हो, वह जीवन को आसान बनाता है, जीने योग्य बनाता है और उसमें हंसी-खुशी के रंग भरता है। निश्छल प्रेम सर्वश्रेष्ठ होता है, जिसकी पहचान स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। प्रेम स्नेह, श्रद्धा, त्याग, समर्पण का नाम है जो जीवन की श्वांस, जीवन का प्राण और जीवन की आत्मा है। संभवतः इसे ध्यान में रखकर ही दूरद्रष्टा संत कबीरदासजी ने कहा कि ‘दोनों हाथ उलीचिए, यह संतन को काम।’ अर्थात प्रेम को बांटो, क्योंकि यह एक वस्तु नहीं, संपूर्ण जीवन है।

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